अगले दो दिन मैं यही सोचता रहा कि गुप्ता अंकल क्यों आ रहे हैं। वजह समझ में नहीं आ रही थी। और दो दिन यूँ ही निकल गए। मैं सोच रहा था कि वो गाय का तबेला जरूर देखेंगे इसलिए मैंने अपने कर्मचारियों से तबेले की अच्छी तरह से सफाई करवाई। सोहना बाजार से मैं खाने-पीने की चीजें लेकर आया, जिसमें नमकीन बिस्कुट मिठाई आदि थे।
गुप्ता अंकल दो बजे दोपहर को गाँव आ गए। वो अपनी बी.एम.डब्लू. कार से आए थे। आते ही मैंने उनसे ठंडा या गरम, चाय-कॉफी लेने को पूछा। पर मैं ये भी सोच रहा था की मैं उनसे क्या बात करूँ क्योकि वे मेरे से ऊम्र में बहुत बड़े थे मेरे दिमाग में से बातें ही नहीं निकल रही थी। असलियत में मैं तो अपने पापा से भी बात नहीं कर पाता था वे उनके ही उम्र के थे। फिर निधि के पापा ने ही बातें शुरू की।
“इतनी सर्दी है, गरम ही चलेगा। आज पता नहीं ठंड ज्यादा लग रही है।”
“हाँ अंकल, यहाँ ठंड ज्यादा ही रहती है। गाँव में पोलूशन नहीं है इसलिए।”
मैंने रहीम को आवाज लगाई कि वो दो गिलास गर्म दूध ले आए। अंकल ने कहा, “बेटे मैं दूध नहीं पीता हूँ, आप चाय ही बनवा लो।”
मैं रसोई में गया और रहीम को कहा, “रहीम दो चाय बनाओ। कम चीनी के साथ अच्छे से पकाकर टेस्टी बनाओ।” फिर मैं अंकल के पास चला गया।
“तुम इन दो कमरों में रहते हो?” अंकल ने पूछा।
“हाँ अंकल, एक को तो मैं अपने आराम के लिए रखता हूँ, दूसरे में मेरा ऑफिस है। वैसे मैं एक घर भी बना रहा हूँ।” अंकल ने मुझे थोड़ा सामान्य किया।
“ठीक है बेटे, पर तुम वैसे यहाँ क्या काम करते हो? निधि बता रही थी तुम डेयरी चलाते हो।”
“हाँ अंकल मैं दूध बेचता हूँ।”
“क्या तुम दूध को दिल्ली ले जाकर बेचते हो?” मैंने हँसते हुए कहा कि
“नहीं अंकल, मैं मदर डेयरी की गाड़ी को दूध दे देता हूँ।”
“पर यहाँ तो ना गाय है ना भैंस ही है।” मैं फिर से हँसने लगा उन्हें इतनी भी क्या ज्लदी है मेरी गाय देखने की सोचते हुए मैंने कहा “सब है अंकल, यहाँ से पीछे ही तबेला है। आप पहले चाय पी लीजिए, फिर हम उसे देखने चलेंगे।” फिर मैंने हिचकते हुए पूछा, “अंकल, आप इतनी दूर गाँव में किसलिए आए हो?”
“काम तो कुछ नहीं। मैं अपनी दुकान से निकलता नहीं हूँ। काफी समय से मैं गाँव देखना चाहता था। निधि ने बताया तुम गाँव में रहते हो और उसी ने बताया कि वो गाँव कई बार देख चुकी है, इसलिए मैं सैर-सपाटे के लिए यहाँ आ गया।”
“अच्छा किया अंकल जो आप यहाँ आए। मैं आपको गाँव दिखा दूँगा।”
रहीम चाय बनाकर ले आया और मैंने मेज पर नमकीन, बिस्कुट और मिठाई रख दी। हम चाय पीने लगे। तभी रहीम की बेटी रेशमा वहाँ आ गई। रहीम ने उसे आवाज लगाई कि वो वहाँ से चली जाए, लेकिन वो मिठाई को घूरती रही। गुप्ता अंकल ने उसे एक-एक मिठाई दोनों हाथों में थमा दी। वो मुस्कुराती हुई चली गई। अंकल ने कहा, “हम तो रोज ये सब खाते ही रहते हैं। असलियत में ये बच्चे ही इन मिठाइयों के असली हकदार होते हैं।” मैंने मुस्कुराते हुए हाँ में सर हिला दिया।
चाय खत्म होते ही अंकल ने कहा, “बेटा बीस गाय तो होगी ही तुम्हारे पास?”
मैंने कहा, “आप चलकर ही देख लें।”
उन्होंने कहा, “चलो। कुछ नया भी देखना चाहिए। कोई तीस साल से मैंने कोई तबेला नहीं देखा है।”
हम दोनों वहाँ से घर के पीछे चले गए। इतने बड़े तबेले को देखने में हमें आधा घंटा लगना था। अंकल इतने बड़े तबेले को देखकर हैरान रह गए। इस तबेले में हर लाइन में बारह-बारह गायें थी और कुल दस लाइन थी। ऊपर कोणीय आकार में छत थी। अंकल ने एक लाइन की गाय को गिना और पूछा, “क्या हर लाइन में बारह गाय है?”
“हाँ अंकल। एक एकड़ में बस गाय ही है।”
“बहुत शानदार! यानी दस लाइन में 120 गाय। पर पास ही एक और तबेला है, उसमें क्या है?”
“वहाँ गाय के बछड़े-बछिया हैं। ये भी सौ से ऊपर हैं।”
“इन बछड़े और बछिया का तुम क्या करते हो?”
“बछड़ों को तो गाँव में बेच देते हैं और बछिया को हम गाय बनाते हैं। ये तीन-चार साल में गाय बन जाती है।”
“बहुत अच्छा। इनसे निकले गोबर का क्या करते हो?” मैं सोचने लगा की अंकल को सच में नहीं पता की गोबर का क्या काम है या वे जानबूझ कर कह रहे हैं की गोबर का क्या करते हैं।
“इसे हम खेत में खाद के लिए इस्तेमाल में लाते हैं।”
“इन सब गाय के रख-रखाव के लिए कितने कामगार हैं?” बड़ा ही अजीब सवाल है वे तो ऐसे मेरे काम को पूछ रहे थे की जैसे उन्हें भी ये काम करना हो। पर फिर भी मैंने बता देना ही ठीक समझा।
“पंद्रह कामगार हैं। उन्हें मैं दस से पंद्रह हजार रुपये महीना देता हूँ। इस तबेले के अलावा एक और तबेला है, जिसको मेरा चचेरा भाई देखता है। उसमें मेरी आधे की हिस्सेदारी है।”
“उस में कितनी गाय हैं बेटा?”
“सौ हैं उस तबेले में।”
“बेटा, इन गायों से कितना दूध निकलता है?”
“एक हजार लीटर दूध का उत्पादन तो इन गायों से हो जाता है इस तबेले से हर रोज।”
“और कितने का बिक जाता है?”
“यही कोई पैंतीस हजार रुपये का हर रोज इस तबेले से बिक ही जाता है। और दोनों तबेलों से पचास हजार का दूध तो बिक जाता है रोज।”
“मैं सोच रहा हूँ अगर मेरा एक बेटा होता तो मैं उसे यह काम करने को कहता।”
उनकी इस बात पर हम दोनों ही हँसने लगे। अंकल ने कहा, “तुम्हें इन पशुओं के लिए ढेर सारा चारा भी लेना पड़ता होगा। कहाँ से ये सब खरीदते हो?”
“मैं ये चारा गाँव से ही खरीद लेता हूँ। इसके अलावा मैं बाजार से भी गुड़, खल, बिनोला आदि भी खरीद लेता हूँ। अंकल मेरे पास इसके अलावा तालाब भी है जिस में मैं मछली पालता हूँ।”
“बेटा ये काम तुम गलत करते हो। मछली पालने से जीव हत्या होती है। इन्हें मारने के लिए मत पाला करो।”
“वो तो अंकल अपनी-अपनी सोच है। मैं आपकी बात से इत्तेफाक जरूर रखता हूँ। मैं भी कई बार इसे बंद करने की सोचता हूँ।”
“हाँ बेटा जब तुम इस काम से ही इतना कमा लेते हो तो इसे बंद ही कर दो। बेटा राघव, तुम ये बता सकते हो कि काम से कितना बचा पाते हो?” अब तो उनहोंने व्यक्तिगत सवाल ही पूछ लिया पर मुझे भी बताने में संकोच नहीं हुआ आखिरकार किसी को तो मेरे काम की परवाह है और पूछने वाला अगर निधि के पापा हो तो बताने में और ही मजा था।
“अंकल आप घर के जैसे हैं इसलिए बता रहा हूँ। नहीं तो ये सब किसी को नहीं बताता। पिछले साल मैंने एक करोड़ अपने काम से कमाए थे। पर अंकल, क्या आप भी ये काम करना चाहते हैं?”
“नहीं बेटा, ये सब मैं किसी और वजह से पूछ रहा हूँ। तुम कह रहे थे घर भी बनवा रहे हो, वो कहाँ है?”
“वो पास में ही है। आप मेरे साथ चलिए दिखाता हूँ।”
मैंने उन्हें अपना बंगला दिखाया। देखकर वो बोले, “बेटा बंगला तो बड़ा है। इस पर क्या खर्च आया है?” अब तो हद ही हो गई पूछने की सोचते हुए मैंने बताना ही ठीक समझा
“अभी तो ये बन ही रहा है, इस में काम बाकी है। पर अब तक अस्सी लाख लग चुके हैं।”
“राघव, एक बात तो तुमने बताई ही नहीं कि ये डेयरी का काम किसने सिखाया?”
“अंकल मैं आठ साल से इस काम में हूँ। शुरूआत में मैंने इंटरनेट-गूगल से और जहाँ से हो सके इस काम की जानकारी इकट्ठा की थी। इसके अलावा मैंने चंडीगढ़ जाकर एक फिल्म भी उस समय देखी थी जिससे बड़ी मदद मिल गई थी। मैंने पापा से नौ लाख रुपये लिए थे काम शुरू करने के लिए। धीरे-धीरे काम बढ़ता रहा और अब इस स्तर पे पहुँच गया है।”
“वाह! तुम एक सफल इंसान हो जो छोटी-सी उम्र में ये कर पाए हो। कम ही ऐसे लोग होते हैं। मैं तुम से इंप्रेस हूँ। तुमने लाख के काम को करोड़ में पहुँचा दिया। पर बेटा तुम्हारी पढ़ाई कहाँ तक हुई है?” सुन कर मेरा सीना चौड़ा हो गया।
“मैं ज्यादा नहीं पढ़ पाया, पर मैं बी.ए. पास हूँ।”
“राघव, तुम शादी कब करोगे? मैं ये सब इसलिए देखने आया हूँ कि तुम्हारा रिश्ता निधि से कर सकूँ।”
मैं चुप रहा। अंकल को सीधा मना नहीं कर पाया इसलिए मैंने कहा, “आपको इस बारे में मेरे मम्मी-पापा से बात करनी होगी। वैसे भी मैं अभी शादी नहीं करना चाहता हूँ।”
“पर निधि और तुम एक-दूसरे को पसंद करते हो न?”
“मैं और निधि अच्छे दोस्त हैं।”
“ठीक है बेटा, तुम शरमा रहे हो तो मैं तुम्हारे रिश्ते के लिए तुम्हारे अभिभावकों से बात कर लूँगा।”
मैंने उन्हें इस बारे में नहीं बताया, पर मैं शादी के लिए राजी भी नहीं था। मैंने अंकल से कहा, “आप गाँव देखना चाहते थे, अगर कहो तो घूम आते हैं।”
“नहीं राघव, मैं तो तुम्हारे बारे में पता करने आया था। अब मुझे चलना है। गाँव फिर कभी देख लेंगे।”
आखिर में चाय पीकर अंकल अपने घर के लिए चले गए। मुझे डर लग रहा था कि कहीं वो निधि का रिश्ता लेकर मेरे घर ना चले जाएँ। मैं जानता था,मेरे घर के लोग रिश्ता कबूल कर लेंगे। मैंने सोचा कि मैं इस रिश्ते के लिए ना कर दूँगा। सोचते हुए मैं सिगरेट पीने लगा।
गुप्ता अंकल के जाने के बाद निधि का मेरे पास फोन आया। उसने कहा, “पापा से तुमने शादी के लिए हाँ क्यों नहीं की?”
“मैं अभी शादी नहीं करना चाहता हूँ इसलिए।”
“पर क्यों?”
“मुझे जिंदगी में बहुत कुछ करना है।”
“झूठ क्यों बोल रहे हो कि मेरे माँ-बाप से बात कर लेना?”
“टालने के लिए और क्या कहता?”
“अगर तुम कह देते कि शादी के लिए तैयार हूँ तो सारा टंटा ही खत्म हो जाता। और तुम शादी ना करने का क्या नाटक कर रहे हो?” वो समझ ही नहीं रही थी मैं उससे शादी नहीं करना चाहता हूँ।
“मैं सच में शादी नहीं करना चाहता हूँ।”
“चुप करो! मैं अंकल से कहकर तुमसे शादी कर ही लूँगी। तेरे इतने भाव क्यों बढ़े हैं? एक-दो तबेले ही तो है तेरे पास, तू कोई टाटा-बिरला नहीं है।”
“तू ही कौन-सी अंबानी है? एक कपड़ों का शोरूम है बस। वैसे भी लोग ये सब मोल से ही खरीदते हैं। मैंने अपनी मेहनत से तबेला बनाया है, किसी की नकल नहीं की है।”
“बहुत अच्छा काम है। गाय के गोबर की बदबू आती है तुम्हारे कपड़ों से तबेले वाले।”
“तुम लड़ क्यों रही हो?”
“इसलिए कि इतने साल से मेरा दिमाग खराब करके रख दिया है तुमने और अब शादी से ना कर रहे हो। दहेज चाहिए अपने दोस्त की तरह तो जगुआर तो दे ही देंगे, इतना भी भाव ना बढ़ाओ, मेरी जैसी लड़की नहीं मिलेगी।” सोचने लगा क्या खास है इस में जो अपने आप को कहानियों वाली परी समझती है।
“अपनी तारीफ अपने आप ना कर। टेढ़ी नाक कद कम तेरी जैसी पता नहीं कितनी लड़कियाँ हैं।”
“मेरी नाक टेढ़ी है? सब जानती हूँ। तेरे पैंट में जो सामान है, वो तेरी तरह काला है। देखा था गोवा में जब तुम सो रहे थे। बात करता है नाक टेढ़ी है। मेरी जैसी नहीं मिलेगी समझे।”
“मेरी पैंट भी खोल ली तुमने, बड़ी बेशरम लड़की हो।”
“हाँ हूँ बेशरम।” और फिर एक गाली देकर उसने फोन काट दिया। मैं सोचने लगा कि बड़ी ही बेशरम लड़की है। इसे जरा भी शर्म नहीं आई मेरी पैंट में झाँकने में।
मैं सोच रहा था कि मेरे शादी के ना करने पर वो मान जाएगी, पर ऐसा नहीं हुआ। उसने दोबारा फोन कर दिया पर मैंने फोन साइलेंट कर दिया और चाय बनाने लगा।
आकर मैंने फोन देखा तो उसने व्हॉट्सएप पर दो मैसेज भेज रखे थे। स्माइली के साथ सॉरी लिखा था। मैंने उसे कोई रिप्लाई नहीं किया और चाय पीने लगा। उसके कुछ और मैसेज आए। उसने कई फोन भी किए पर मैंने फोन नहीं उठाया। फोन बजता रहा तो तंग आकर मैंने उठा लिया। जैसे ही मैंने फोन उठाया और कहा ‘कमीनी’ तो उधर से अमित की आवाज आई। उसने पूछा, “ये कमीनी कौन है?”
मैंने ये सुनते ही फोन काट दिया। मेरा मन उससे बात करने का नहीं था। लेकिन फिर से फोन की घंटी बजी। फोन निधि का था। मैंने फोन नहीं उठाया और बाहर चला गया।
रात को बारह बजे निधि का फिर से फोन आया, “तुमने पापा को शादी के लिए क्यों मना कर दिया? मैंने बड़ी मुश्किल से उन्हें मनाया था। अगर तुम्हें दहेज चाहिए तो दे देंगे पर ऐसे मेरे से बेवफाई मत कर।”
मैंने बात को काटते हुए कहा, “पर निधि मैं अभी शादी नहीं करना चाहता हूँ।” उसने मेरी बात को पूरा होने से पहले ही कहा, “मैं तेरे लायक नहीं हूँ?”
“ऐसा नहीं है।”
“तो बात क्या है? बदसूरत हूँ? कंगली हूँ? हरिजन हूँ? या बनिया नहीं हूँ? चोर हूँ? बदचलन हूँ? रंडी हूँ? या काली-कलूटी हूँ? कोई तो वजह बता ना करने की।”
“वजह कुछ नहीं, यही समझ ले प्यार नहीं करता हूँ।”वो मुझे बड़ी ही अपसेट लग रही थी फोन से सुनने पर। वो शायद रो भी रही थी मैं उसके रोने को महसूस कर सकता था पर वो शादी अब भी मुझसे ही करना चाहती थी।
“तो प्यार किससे करता है? किसी गाँव की अनपढ़ से जो घाघरा चोली पहनती है?”
“किसी से नहीं, मुझे बस पैसे कमाने से प्यार है।”
“तो कौन रोक रहा है? खूब कमाओ। मैं अपना बोझ भी नहीं डाल रही हूँ। मैं अपने खर्चे अपने आप कर लूँगी, बस तुम मान जाओ। ऐसे फैसले दिल से करो दिमाग को भूल जाओ और पैसे की बात छोड़ दो। तुम्हारे पैसे मेरी कमाई से और बढ़ जाएँगे और क्या चाहते हो?”
“चाहता तो बस यही हूँ कि शादी नहीं करनी है।”
“पर क्यों? मुझे जवाब चाहिए कि तुम क्यों मना कर रहे हो।”
“मैं जवाब नहीं दे सकता। समझो हमारा रिश्ता नहीं हो सकता है क्योंकि जबरदस्ती शादी नहीं कर सकता हूँ।” उस की सिसकियो से अब मुझे साफ पता चल रहा था की वो रो रही थी। पर वो शादी पर अड़ी रही चाहे मैं राजी हूँ या नहीं।
“पर राघव, मेरे पेरेंट्स नहीं मान रहे हैं। वे इस सर्दी में मेरी शादी कर देंगे, फिर क्या करोगे? तुम्हारे मेरे तक पहुँचने के सारे रास्ते बंद हो जाएँगे। मैं तुमसे प्यार करती हूँ। मैंने तुमसे प्यार किया है शादी भी तुम्हारे साथ करना चाहती हूँ। मैं तुम्हारे शादी के खर्च को भी वापस कर दूँगी, अगर तुम्हारे पास शादी के पैसे ना हों तो। अगर तुम कहो तो मैं शादी का खर्च भी अकेले ही उठा लूँगी। खाते-पीते घर से हूँ, ये भी कर ही लूँगी। बस मान जाओ। मैं तो शादी भी डेस्टिनेशन मैरिज करूँगी, तुम्हें खर्च करने की कोई जरूरत नहीं है।”
“पर निधि, हम एक साल और नहीं रुक सकते हैं?” मैंने शादी से बचने के लिए कहा।
“नहीं, मेरे घर के लोग नहीं मान रहे हैं। मेरे पापा किसी और से मेरी शादी कर देंगे।”
“तो फिर ठीक है, कहीं और शादी कर लो।”
“कमीने! सारी जिंदगी तुझे लेटर देती आई हूँ, शादी किसी और से करूँ? तेरे जैसा हरामी मैंने देखा नहीं है।” उसने मेरे ऊपर गालियों की बौछार कर दी और फोन काट दिया। मुझे लगा टंटा खत्म हो गया और अब वो मुझे दुबारा फोन नहीं करेगी। मैं उसके बारे में ही सोचता रहा कि तभी उसने व्हॉट्सएप कर दिया। जिसमें लिखा था- ‘शादी तो होगी, तुम्हारी राजी से या पीटाई करके जैसे भी हो।’ उसने एक स्माइली भेजी थी। मैं उसे देखकर मुस्कुराने लगा।
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