डांस का प्रोग्राम आठ बजे शुरू होने वाला था....इमरान ने साढ़े सात बजे तक बहुत-सी जानकारियाँ हासिल कर लीं.... आर्टामोनॉफ़ वाली पार्टी पन्द्रह लोगों की पार्टी थी, जिन में से पाँच लड़कियाँ थीं। उन्हीं में मोरीना भी शामिल थी....पार्टी स्पेन से आयी थी और पूरे एशिया का दौरा उसके प्रोग्राम में शामिल था।

इमरान को ऑर्केस्ट्रा का टिकट हासिल करने के लिए घूस देनी पड़ी, क्योंकि ज़्यादातर सीटें एडवांस बुकिंग में रिज़र्व हो गयी थीं।

पूरा हॉल भर गया था....और बाहर हाउस फ़ुल का बोर्ड लगा दिया गया था, लेकिन फिर भी लोगों का यह आलम था कि बुकिंग हाउस की बन्द खिड़कियों पर टूटे पड़ रहे थे। आख़िर हालात इतने नाज़ुक हो गये कि पुलिस को भीड़ पर क़ाबू करने के लिए लाठी चार्ज करना पड़ा।

अन्दर हॉल में स्टेज का पर्दा दो हिस्सों में बँट कर दोनों कोनों की तरफ़ खिसकता चला गया। पूरे स्टेज पर आग की लपटें नज़र आ रही थीं, आग बनावटी नहीं, बल्कि असली थी, क्योंकि अगली सीटों पर बैठे हुए लोगों को सचमुच जहन्नुम का मज़ा आ गया था।

स्टेज सीटों की सतह से काफ़ी ऊँचा था। इसलिए इस बात का अन्दाज़ा करना मुश्किल था कि आग पूरे स्टेज पर फैली हुई थी या बीच में कुछ जगह ख़ाली भी रखी गयी थी। वैसे देखने से यही लगता था कि पूरे स्टेज पर आग की लपटों के अलावा और कुछ नहीं है।

अचानक सारा हॉल साज़ों की आवाज़ से गूँजने लगा....और आग की लपटों के बीच एक ख़ूबसूरत चेहरा दिखा। वह भी आग ही का मालूम होता था।

आग....संगीत....और आतिशीं चेहरे ने कुछ ऐसी फ़िज़ा पैदा कर दी कि तमाशाइयों को डांस की शुरुआत और ख़त्म होने का एहसास ही न हो सका। शायद ही कोई यह बता सकता कि डांस कितनी देर तक होता रहा था।

तालियों की गूँज पर लोग चौंके और उन्हें एहसास हुआ कि वे मशीनी तौर पर तालियाँ पीट रहे हैं। इसमें उनके इरादे का दख़ल नहीं था।

लगातार डेढ़ घण्टे तक स्टेज पर आग नज़र आती रही और उतनी देर में मोरीना ने तीन डांस पेश किये। एक में वह अकेली थी और दो डांस उसने चार लड़कियों के साथ पेश किये थे।

प्रोग्राम के ख़त्म होने पर ग्रीन रूम के सामने आदमियों का समन्दर ठाठें मार रहा था.... वे सब मोरीना को क़रीब से देखने के ख़्वाहिशमन्द थे, इसलिए इमरान को यक़ीन था कि वह किसी चोर दरवाज़े से निकल कर अपनी होटल की तरफ़ भागेगी।

प्लाज़ा की बिल्डिंग दोमंज़िला थी। नीचे हॉल था और ऊपरी मंज़िल पर ग्रैण्ड होटल। मोरीना भीड़ से बचने के लिए होटल ही को फ़रार होने का रास्ता बना सकती थी। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं था।

होटल की दो सीढ़ियाँ थीं। एक तो सड़क पर ले जाता था और दूसरा गली में। इमरान ने सड़क वाली सीढ़ियों को भी ज़ेहन से निकाल दिया। दूसरे पल वह गली की तरफ़ बढ़ रहा था। गली पतली ज़रूर थी, लेकिन अँधेरी नहीं थी और वहाँ सचमुच इमरान को एक लम्बी-सी कार खड़ी दिखाई दी। गली में उसकी मौजूदगी का कोई तुक नहीं था। इमरान बड़ी तेज़ी से गली से निकल कर अपनी टू-सीटर के क़रीब आया और उसे यह देख कर बिलकुल हैरत नहीं हुई कि इसमें कैप्टन फ़ैयाज़ विराजमान था।

उसे शाम ही से इसका एहसास था कि कैप्टन फ़ैयाज़ उसका पीछा कर रहा है।

उसने उसकी तरफ़ ध्यान दिये बग़ैर दरवाज़ा खोला और स्टीयरिंग के सामने बैठ कर इंजन स्टार्ट किया। फिर गाड़ी प्लाज़ा की पिछली गली की तरफ़ रेंगने लगी। इमरान इतनी बेताल्लुक़ी से स्टीयरिंग करता रहा जैसे उसे अपने क़रीब फ़ैयाज़ की मौजूदगी मालूम न हो।

‘‘किधर चल रहे हो?’’

अचानक फ़ैयाज़ ने पूछा और इमरान ‘‘अरे बाप’’ कह कर इस तरह उछल पड़ा कि गाड़ी एक दीवार से टकराते-टकराते बची....और फिर इमरान के मुँह से कुछ इस क़िस्म की आवाज़ें निकलने लगीं जैसे वह नींद की हालत से डर कर जाग पड़ा हो।

‘‘क्या बेहूदगी है! गाड़ी सँभालो।’’ फ़ैयाज़ ने स्टीयरिंग पर हाथ रखते हुए कहा।

‘‘नहीं! मेरी जेब में कुछ नहीं है।’’ इमरान रो देने वाली आवाज़ में बोला। ‘‘क़सम ले लो भाई।’’

‘‘ओ इमरान के बच्चे।’’

‘‘आँ....हाँय....तो यह तुम हो! फ़ैयाज़....!’’ इमरान बड़बड़ाया। ‘‘अगर मेरा हार्टफ़ेल हो जाता तो....’’

‘‘सच कहता हूँ, किसी दिन तुम्हारी सारी शेख़ी निकाल दूँगा!’’ फ़ैयाज़ ने ना ख़ुश होते हुए कहा। इमरान कुछ न बोला। उसने अपनी टू-सीटर गली में खड़ी कर दी। वह लम्बी कार से काफ़ी दूरी पर थे और टू-सीटर अँधेरे में थी। इमरान ने इंजन बन्द कर दिया।

‘‘यहाँ क्यों आये हो?’’ फ़ैयाज़ ने पूछा।

‘‘तुमसे इश्क़ हो गया है मुझे!’’ इमरान एक ठण्डी आह भर कर सीने पर हाथ मारता हुआ बोला। ‘‘बहुत दिनों से सोच रहा था कि इश्क़ का इज़हार कर दूँ....लेकिन हिम्मत नहीं पड़ती थी....आज पड़ गयी है, क्योंकि आज तुम अपनी बीवी को साथ नहीं लाये....ज़ालिम समाज के डर से....अरे, बाप-रे-बाप....मज़हब के ठेकेदारों के डर से....और वह सब क्या होता है....वग़ैरह-वग़ैरह वही सब कुछ जो नॉवेलों में होता है....वह सब कुछ कहने के बाद मैं यह कहता हूँ कि मुझे तुमसे प्यार हो गया है....आओ, हम तुम बहुत दूर भाग चलें....बहुत दूर.... मिसाल के तौर पर कुतुब शुमाली या कुतुब जुनूबी या कुतुब लाट....हाय मेरे पेट में यह मीठा-मीठा दर्द क्यों हो रहा है.... शायद इसी का नाम मोहब्बत है कोफ़्ता....अरे, बाप-रे-बाप भूख लगी है....और मैं इस वक़्त कोफ़्ते खाना पसन्द करूँगा! फ़ैयाज़ माई डियर....हिप....! श् श श् श....ख़ामोश....!’’

मोरीना सीढ़ियों से उतर कर कार की तरफ़ बढ़ रही थी। उसके साथ तीन आदमी भी थे।

अगली कार के गली से निकलते ही इमरान की टू-सीटर भी आगे बढ़ गयी.... फ़ैयाज़ खामोशी से सब कुछ देखता रहा। टू-सीटर अगली कार का पीछा कर रही थी। फ़ैयाज़ ने मोरीना को पहचाना नहीं था, क्योंकि उसके कोट के कॉलर पर लगे हुए समोर की ऊँचाई उसके कानों के ऊपरी हिस्से तक थी.... और उसके सिर पर हैट भी था। इमरान ने भी सिर्फ़ अन्दाज़े से उसे मोरीना समझ लिया था। मगर यह हक़ीक़त थी कि उसने अन्दाज़ा लगाने में ग़लती नहीं की थी।

‘‘हाँ, पोस्ट मॉर्टम की रिपोर्ट क्या कहती है?’’ इमरान ने अचानक पूछा।

‘‘ज़हर और माथे का ज़ख़्म....ज़ख़्म के अन्दर छोटे-छोटे पत्थर मिले हैं और उनमें से कुछ तो हड्डी में घुसते चले गये थे। ऐसा मालूम होता है जैसे वे पत्थर किसी प्रेशर वाली मशीन से फेंके गये हों। और हालात के एतबार से वे हीरे जैसे किसी पत्थर के छोटे-छोटे दाने लगते हैं।’’

‘‘हाँ तो....मेरा ख़याल गलत नहीं निकला।’’

‘‘तुम्हारा ख़याल गलत कभी निकला है प्यारे!’’ फ़ैयाज़ उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगा।

इमरान कुछ न बोला। वह बड़ी संजीदगी से किसी मामले पर ग़ौर कर रहा था। थोड़ी देर बाद फ़ैयाज़ ने कहा। ‘‘हाँ, एक दूसरी ख़ास बात जो हालात के एतबार से अजीब है। वह अँगूठी अब बहुत ज़्यादा शक के दायरे में आ गयी है।’’

‘‘क्यों? शक के दायरे में क्यों?’’

‘‘कोट के अन्दर की जेब का अस्तर फटा हुआ नहीं था....! कहीं भी कोट में कोई रुकावट मौजूद नहीं है जिसके ज़रिये अँगूठी ऊपर के कपड़े और अस्तर के बीच में पहुँच सके। तुम ख़ुद सोचो कि ऐसी सूरत में इसके अलावा और क्या कहा जा सकता है कि अँगूठी जान-बूझ कर कोट के अन्दर रखवायी गयी थी।’’

‘‘लेकिन वह निकाली किस तरह गयी?’’ इमरान ने पूछा।

‘’कोट के दामन को थोड़ा चीर कर।’’

‘‘हाँ तो अच्छा वह कोट! उसे मेरे पास भिजवा देना।’’

‘‘भिजवा दूँगा....मगर इसका मक़सद क्या हो सकता है।’’

‘‘मक़सद बताने की फ़ीस साढ़े चार रुपए होती है।’’

‘‘यार इमरान, ख़ुदा के लिए मज़ाक़ न करो।’’

‘‘यही जुमला अगर तुमने नाक पर उँगली रख कर कहा होता तो तुम्हारी बीवी सीधी मेरे दफ़्तर चली आती और मुझे उससे काफ़ी फ़ायदा पहुँचता।’’

‘‘बकवास मत करो।’’ फ़ैयाज़ फिर उखड़ गया।

अगली कार होटल अलास्का के सामने रुक गयी। मोरीना और उसके तीनों साथी उतर कर होटल में चले गये और इमरान अपनी गाड़ी काफ़ी दूरी पर रोक कर फ़ैयाज़ को वहीं बैठने का इशारा करता हुआ आगे बढ़ गया। होटल के पोर्च में दरबान अकेला खड़ा था और वे उसके क़रीब से गुज़र कर अन्दर गये थे। इमरान पोर्च में ही रुक कर दरबान से ग़प्पें लड़ाने लगा। बातों-ही-बातों में उसने न सिर्फ़ मोरीना के उस होटल में रहने के बारे में मालूम किया, बल्कि यह भी पूछ लिया कि वह और उसके साथी किन नम्बरों के कमरों में ठहरे हुए हैं।

मोरीना ने अपने ठहरने की जगह के बारे में कोई ऐलान नहीं किया था। इसलिए कुछ लोग ही उसके रहने के बारे में जानते थे। उसने दरबान से यह भी मालूम किया कि वह किस वक़्त होटल में होती है।

वापसी पर फ़ैयाज़ ने उससे पूछा। ‘‘यह किस औरत का पीछा हो रहा था?’’

‘‘एक ऐसी औरत का जिसका शौहर उसे तलाक़ देना चाहता है और मैं तलाक़ के लिए सबूत तलाश कर रहा हूँ। सुपर फ़ैयाज़! तुम मेरे बिज़नेस के मामले में टाँग मत अड़ाया करो। जासूसी से मेरा पेट नहीं भरता।’’