हसीनाबाद, सन 1975।
आज रात फिर से पूर्णमासी थी। हालाँकि कुहरा अधिक घना नहीं था लेकिन वातावरण फिर भी सर्द था। ठण्डी हवा के झोंकों से पेड़ों की टहनियाँ धीरे-धीरे लहरा रही थीं। जमुना बग्घी से उतरा और खाने की पोटली लेकर डाक-बंगले की ओर बढ़ गया लेकिन बंगले के सामने पहुँचते ही ठिठक कर खड़ा हो गया, कारण कि दूसरी मंजिल पर उसे हलचल का आभास हुआ था। बरामदे में व्याप्त लालटेन की रोशनी में उसने ध्यान से देखा तो पाया कि वह पशुपति था, जो कहीं जाने की तैयारी कर रहा था।
जमुना के मन में संदेह का साँप सिर उठाने लगा और उसकी आँखें गोल हो गयीं। पशुपति को हसीनाबाद में डेरा डाले हुए महीने भर से ऊपर हो रहा था और इस वक्फे में एक भी पल ऐसा नहीं गुजरा था, जब जमुना उसकी ओर से निश्चिंत रहा हो। पशुपति की ओर से उसे जो उजरत हासिल होती थी, उसमें इस बात का भी करार हुआ था कि वह उसके लिए दोपहर और रात का भोजन ले आया करेगा। जमुना इस करार को मुसलसल पूरा भी कर रहा था लेकिन आज पहली दफा हुआ था, जब भोजन के वक्त पशुपति कहीं जाने की तैयारी कर रहा था; वो भी रात के दस बजे, जब पूरा जंगल और समूचा कस्बा अँधेरे व कुहरे की दोहरी चादर ओढ़कर सो रहा था।
जमुना ने भयभीत निगाहों से पूरे चाँद की ओर देखा। कस्बे में जब से वह रहस्यमयी मेहमान आया था, तब से पूर्णमासी की रात उसके लिए खौफ और दहशत का बायस बनकर आती थी। वह इस कदर खौफ़जदा रहता था कि उस रात को आँखों ही आँखों में गुजार देता था और जब भोर की पहली किरण धरा का आलिंगन करती थी, पक्षियों का कलरव जन-जीवन को जिजीविषा का बोध कराता था तो वह यूँ लम्बी साँस लेता था, जैसे उसे नया जीवन मिला हो।
जमुना तुरंत एक पेड़ की ओट में हो गया और पशुपति की हरकतों पर नजर रखने लगा। दूर जंगल से कबाइलियों के नाचने-गाने की आवाजें आ रही थीं।
“पेड़ की ओट में क्यों छिपे हैं जमुना जी?” बरामदे से पशुपति की आवाज़ आयी- “ऊपर आ जाइए, आज आपके मदद की जरूरत है मुझे।”
जमुना को अब तक पशुपति द्वारा इस तरह चौंकाए जाने की आदत पड़ चुकी
थी इसलिए वह इस बात को लेकर हैरान नहीं हुआ कि दूसरी मंजिल पर काम में मशरूफ उस इंसान ने उसकी मौजूदगी को कैसे भाँप लिया था, जबकि बग्घी उसने डाक-बंगले के कंपाउंड के बाहर ही छोड़ दी थी और अपने आगमन की कोई आहट तक नहीं उत्पन्न की थी। जब वह टिफ़िन लिए हुए ऊपर पहुँचा तो पाया कि तख़्त पर रुई का बण्डल पड़ा हुआ था और पशुपति उसकी छोटी-छोटी गोलियाँ बना रहा था। उसके बदन पर ओवरकोट और पाँव में जूते थे। दास्ताने भी तख़्त पर ही पड़े हुए थे।
“गेट पर घोड़ों की हिनहिनाहट सुन ली थी मैंने...।” पशुपति ने अपने काम में डूबे हुए ही कहा- “...इसलिए समझ गया कि आप ही हैं क्योंकि ये आपके ही आने का तो वक्त होता है।”
जमुना कुछ कहने के बजाय उसे गोली बनाते हुए देखता रहा।
“न जाने क्यों आज कान में बहुत दर्द हो रहा है। शायद दवा में डूबे रुई के ये फाहे कुछ आराम दे सकें।” पशुपति ने मानो उसके मन को टटोल लिया।
हालाँकि जमुना को वहाँ रुई के अतिरिक्त दवा की कोई शीशी नजर नहीं आयी लेकिन ऐसे वाकयात पर सवाल करना वह कब का छोड़ चुका था।
“आप कहीं जा रहे हैं?” उसने पूछा।
“ओह, हाँ।” पशुपति कुछ पलों के लिए अपना काम रोककर जमुना से मुखातिब हुआ- “आपका घोड़ा चाहिए मुझे।”
“घ...घोड़ा...पर क्यों साहब?”
“नहीं बताऊंगा तो क्या नहीं देंगे?” पशुपति प्रत्यक्ष में हँस कर बोला, ये बात जुदा थी कि उसकी हँसी और सवाल, दोनों में जमुना को एक चेतावनी का आभास हुआ।
“मेरा मतलब ये था साहब कि घोड़े ही मेरी आमदनी का साधन हैं। उन्हें आपको...।”
“घबराइए मत।” पशुपति उसकी बात काटकर बोला- “सुबह तक लौटा दूँगा और इसके लिए आपको पेमेंट भी करूँगा।”
“पर..पर इतनी रात को आप जाएंगे कहाँ?”
“जंगल में।” पशुपति का लहजा अचानक गंभीर हो गया।
“ज..ज..जंगल में?” जमुना का स्वर काँपा। अनायास ही उसकी नजर पीपल के ऊपर चमक रहे चाँद पर चली गयी- “आज तो पूर्णमासी है साहब।”
“तभी तो जा रहा हूँ।” पशुपति ने भी चाँद की ओर देखते हुए अर्थपूर्ण लहजे में कहा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक को उभरते हुए जमुना ने साफ़-साफ़ देखा। चाँद से दृष्टि हटाकर पशुपति फिर से उससे मुखातिब हुआ और
बोला- “जवाब दीजिए।”
“जवाब की क्या जरूरत है साहब।” जमुना ने अपनी असमंजसता को जबरदस्ती की हँसी के पीछे छिपाते हुए कहा- “कभी मना किया है क्या आपको?”
“कीजिएगा भी मत.....।” पशुपति थमा, जहरीली मुस्कान मुस्काराया फिर आगे बोला- “...क्योंकि मौत हर बार सपने में नहीं आती है।”
“मैं बग्घी से एक घोड़ा खोलकर यहाँ कंपाउंड में बाँध जाता हूँ।” जमुना ने जल्दी से कहा, मानो विषय बदलना चाहता हो।
पशुपति ने पलक झपकाकर सहमति जताई।
“ये खाना रख जाऊँ?” उसने टिफिन की ओर संकेत करते हुए कहा।
“नहीं। पूर्णमासी की इस रात ने आज मेरे लिए लजीज दावत का इंतजाम किया है।” पशुपति ने एक बार फिर चाँद की ओर देखा, फिर जमुना की ओर मुड़ा और कहा- “अब तुम जाओ।”
उसके जाने के बाद उसने रुई की गोलियों को कान में ठूँस लिया तत्पश्चात सर्दी से बचने के लिए एक लम्बी टोपी धारण कर ली, जिसने उसके दोनों कानों को बखूबी ढक लिया। उक्त कार्य को अंजाम देने के बाद उसने जंगल से आ रही कबाइलियों की आवाजें सुनने की कोशिश की मगर कुछ सुनाई नहीं दिया। उसने नीचे कंपाउंड में नजर डाली, जहाँ जमुना अपने घोड़े को एक पेड़ से बाँध रहा था, इसके बाद हाथ के पंजों पर दस्ताने चढ़ाने लगा। कान में रुई ठूँसने से लेकर अब तक के इस छोटे से समयांतराल के बीच पशुपति की भाव-भंगिमाओं एक उल्लेखनीय परिवर्तन हो रहा था। उसके चेहरे पर पल-प्रतिपल वहशत बढ़ती जा रही थी।
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साकेतनगर, वर्तमान।
रेस्टोरेंट में बैठा फाह्याज़ सेलफ़ोन की गैलरी में अपनी बीवी की तस्वीरों को स्वाइप कर रहा था। शबनम के साथ पेश आयी दुर्घटना से कुछ दिन पहले क्लिक की हुई उन तस्वीरों में सर्वनिष्ठ बिंदु ये था कि शबनम की हंसली पर वही निशान नुमाया हो रहा था, जो विनायक की लाश पर से बरामद हुआ था। टेबल पर रेस्टोरेंट का मीनू पड़ा था लेकिन फाह्याज़ ने कॉफ़ी के अलावा कुछ नहीं ऑर्डर किया था। कॉफ़ी भी आधी ही ख़त्म की थी उसने, जबकि सुबोध को गये हुए घंटा भर होने को आ रहा था। शबनम की हंसली पर वह निशान ईद के चाँद की मानिंद इतना बारीक था कि ध्यान से देखे बिना उसका नजर आना नामुमकिन था। सेलफोन के कैमरे से ली गयी उन तस्वीरों पर दर्ज ऑटोमैटिक डेट के मुताबिक़ दो से तीन दिन के अंतराल के बाद वाली तस्वीरों में वह निशान इतना स्पष्ट हो चुका था कि आसानी से किसी का ध्यान अपनी ओर खींच सकता था।
‘शबनम ने कभी बताया क्यों नहीं? या फिर उन दिनों खुद मेरी ही नजर इस वाहियात चीज पर क्यों नहीं गयी?’
मन में उठे इस सवाल को फाह्याज़ ने ज़ेहन के सामने रखा तो जवाब मिला कि मुमकिन है, शबनम का ध्यान इस पर गया हो लेकिन उसे बताने से पहले ही दुर्घटना का शिकार हो गयी हो। और जहाँ तक निशान पर खुद उसकी नजर न पहुँचने का सवाल है तो इतना मौक़ा ही कहाँ मिला था उसे। शुरूआती दो से तीन दिनों तक वह निशान किसी की तवज्जो हासिल करने के काबिल ही नहीं हुआ था और जब हुआ था, तब जरूरी नहीं था कि दिन के पंद्रह से अट्ठारह घंटे बाहर गुजारने वाले उस शख्स का ध्यान बीवी की हंसली पर बने निशान पर जाकर ही रहे। उसके बाद हो सकता था कि वह निशान उसकी तवज्जो हासिल कर लेता, लेकिन तब तक तो जिस्म पर आसमानी आफ़त का वह दस्तखत पाने वाली शबनम ही इस दुनिया से उठ गयी थी। यही जवाब फाह्याज़ को इस सवाल पर भी सटीक बैठता हुआ लगा कि अगर शबनम को भी विनायक की तरह ही आदमभेड़िये के सपने आने लगे थे तो उसने ये बात किसी से साझा क्यों नहीं की?
तस्वीरों को घूरते-घूरते फाह्याज़ के नेत्र संकुचित हो गये। अब इसमें कोई संशय नहीं था कि उक्त सिलसिला अपसामान्य था, जिसे ख़त्म न करने की सूरत में आगे न जाने कितनी जानें जा सकती थीं। विनायक के क़त्ल से शुरू हुई कहानी अब इस सवाल पर आकर ठहर गयी थी कि वह कौन सी एंटिटी थी, जो एक चित्रकार के जरिये अपना शिकार चुन रही थी? किस नियम के तहत चुन रही था और क्यों चुन रही थी?
“कहाँ खोए हुए हैं सर?”
फाह्याज़ हल्के से चौंककर विचारों के भंवर से बाहर आया तो देखा कि सुबोध सामने खड़ा था। उसके हाथ में एक पॉलीबैग था, जिसमें उसने कामरान की बनाई हुई तस्वीरें रख ली थीं।
“लौट आये आचार्य जी?”
“जस्ट अभी।” कहने के साथ ही सुबोध भी एक कुर्सी पर काबिज हो गया और बोला- “कुछ सोच रहे थे आप?”
“शबनम की तस्वीर निकालिए।”
सुबोध ने निकाला। फाह्याज़ ने उस पेंटिंग पर कामरान की ओर से विद
सिग्नेचर दर्ज की गयी तारीख को देखा और फिर अपने सेलफोन में मौजूद शबनम की उस तस्वीर को, जो उक्त तारीख को क्लिक की गयी थी। नैक्रोमेंसी का सिगिल उस तस्वीर में बेहद बारीक दिखाई दे रहा था।
“कुछ नोटिस किया क्या आपने?”
“विनायक जैसा ही निशान शबनम के बदन पर भी बन रहा था। इसीलिए उस निशान को देखकर बार-बार मुझे लग रहा था कि मैंने उसे पहले भी कहीं देखा है।”
“तो क्या उन दिनों ही देखा था, जब मैडम जिंदा थीं?”
“नहीं।” फाह्याज़ ने गहरी साँस लेकर सेलफोन को टेबल पर छोड़ दिया- “काश देखा होता। शायद इन तस्वीरों में ही कभी देखा रहा होगा, जो आज भी मेरे सेलफोन में पड़ी हुई हैं।” थोड़ा रुककर फाह्याज़ ने कहा- “इस बात में अब शक की कोई गुंजाइश नहीं है कि कामरान के हुनर पर वाकई मनहूसियत का काला साया है क्योंकि जो चीजें विनायक के साथ हो रही थीं, वही चीजें शबनम के साथ भी हो रही थीं। ये जुदा है कि इन केस ऑफ़ शबनम वे चीजें किसी की तवज्जो पाने की हद तक मैच्योर नहीं हो पायी थीं। मुमकिन है कि एकाध बार आये आदमभेड़िये के सपने को शबनम ने कभी-कभी आने वाला कोई वीयर्ड सपना समझकर अवॉयड कर दिया रहा हो। अच्छा ही हुआ, जो उसके साथ हादसा हो गया, वरना मैं विनायक की तरह उसकी कटी-फटी बॉडी देखकर पागल ही हो जाता।”
“विनायक की मौत इसलिए भी हुई क्योंकि वह अकेला रहता था। अगर कोई उसके साथ होता तो शायद वह विनायक को पजेशन में आकर खुद को मारने से रोक लेता।”
“कब्रिस्तान के चौकीदार से क्या इनफार्मेशन मिली?” फाह्याज़ मुद्दे पर आया।
“कामरान की बातें सही हैं। वह सच में रात का खाना लेकर माँ की कब्र पर जाता है और खाना खाते हुए, कब्र से मुखातिब होकर ऐसे बातें करता है, जैसे माँ उसके सामने बैठी हुई हो। हर रोज चौकीदार जब उसे पानी पहुँचाने वहाँ जाता है, तब वह दो डिस्पोजेबल थाली में खाना परोस चुका होता है या परोस रहा होता है।”
“इस पर चौकीदार की राय ली आपने?”
“बिल्कुल ली, लेकिन वह तो कामरान की ही दलीलों को मजबूत करने में लग गया। कब्रिस्तान जैसी जगह पर अपनी लम्बी चौकीदारी के अनुभव का हवाला देते हुए वह मुझे रूहों और खबीसों के किस्से सुनाने लगा। कहने लगा कि कब्र में मरे हुए लोगों की रूहें होती हैं, जो कयामत के दिन उठाये जाने का इंतजार कर रही होती हैं। इसलिए इस बात को लेकर हमें किसी का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए कि वह अपने मरहूम अजीज की कब्र पर जाकर उससे बातें करता है। उसने ये भी कहा कि कुछ पीर-फ़कीर टाइप के लोग कब्र में सो रही रूहों से आसमानी आफ़तों की बाबत राय-मशविरा करते हैं।”
“तुमने उससे पूछा कि उस खाने का क्या होता है, जो वह माँ के लिए परोसता है?”
“उसने बताया कि अगली सुबह जब वह कब्र के पास जाता है तो कब्र पर रखी डिस्पोजेबल थाली खाली होती है, जैसे सचमुच किसी ने आकर खाना खाया हो।”
“कामरान की अम्मी की कब्र के आस-पास होने वाली किसी और गतिविधि के बारे में उससे जानने की कोशिश की आपने?”
“कोशिश की तो थी सर लेकिन वह शख्स इस पूर्वाग्रह से बुरी तरह ग्रस्त है कि भूत होते ही होते हैं। वह तार्किक होकर बात कर ही नहीं रहा था। मेरे हर सवाल का एक फंतासी जवाब देता था और उसके सपोर्ट में कई उदहारण गिना देता था। बातचीत के किसी बिंदु पर वह ये भी कह देता कि रात में कामरान की माँ कब्र से निकलकर टहलती है, तो मुझे कोई हैरानी नहीं होती। अब इतने बायस्ड शख्स की कही हुई बातों की ऑथेंटिसिटी की क्या गारंटी है, जो हम उन्हें अपनी तफ्तीश में इस्तेमाल करें।”
“अब ये मामला वैसा रहा ही नहीं आचार्य जी कि हम ऑथेंटिक फैक्ट्स के आधार पर आगे बढ़ें। हमारे मसले में अब लोगों के अनुभव ही किसी काम के लायक हो सकते हैं; चाहे वे ख्याली पुलाव ही क्यों न हों। चलिए चलते हैं।” फाह्याज़ खड़ा होते हुए बोला- “ग्राफिक वाला काम पूरा करके इंटरनेट खंगालिए और देखिए क्या हाथ लगता है।”
“श्योर सर।” सुबोध ने भी फाह्याज़ का अनुसरण करते हुए कहा।
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हसीनाबाद, सन 1975।
पशुपति उस जगह से महज़ थोड़े ही फासले पर मौजूद था, जहाँ कबाइलियों की रस्म चल रही थी। उसके चेहरे पर एक भी जर्रा ऐसा नहीं था, जो वहशत और दरिंदगी की आतिश में फ़ना होने से रह गया हो। उसकी आँखें रक्ताभ थीं और होंठ बुरी तरह फड़क रहे थे। अपनी पाशविकता को जब्त करने के कठिन प्रयास में उसकी भंगिमाएं इतनी विकृत हो रही थीं कि बोध होता था ‘नरपिशाच’ संज्ञा उसी के लिए है। कबाइलियों के समूह में जल रहे भीषण अलाव और तमाम मशालों की रोशनी की लहर जंगल के उस हिस्से तक आ रही थी, जहाँ पशुपति किसी फ़िराक में घात लगाये हुए खड़ा था।
रस्म में डूबे हुए कबाइलियों को इस बात की तनिक भी भनक नहीं थी कि उनसे चंद गज के फासले पर एक पेड़ की ओट में खड़ा कोई भयानक मखलूक उन्हें ही घूर रहा है। पीली रोशनी में पशुपति निहायत ही खौफ़नाक नजर आ रहा था। उसने अपने जबड़े भींचे और दाहिने हाथ का पंजा पेड़ के तने पर रख दिया। उसका पंजा खून से सना हुआ था, जिसे उसने जब तने पर से हटाया तो वहाँ एक भेड़िये के पंजे की लाल अनुकृति छप चुकी थी।
पशुपति कायांतरण से गुजर रहा था। उसके बदन पर काले बाल उग रहे थे और वह तेजी से भेड़िये में रूपांतरित हो रहा था। उसके सिर की टोपी, जिसे उसने सर्दी से बचने के लिए धारण किया था, कब का गिर चुका था। ज्यों-ज्यों यह रूपांतरण के आख़िरी चरण में पहुँच रहा था, त्यों-त्यों उसके हलक से दर्द भरी घुटी-घुटी चीखें निकल रही थीं। ये दर्द उसकी मुकद्दर का हिस्सा था क्योंकि वह संसार के उन दुर्लभ लोगों में से था, जिनके अंदर पाशविकता अन्य लोगों के मुकाबले ज्यादा होती है और जिसे जब्त करने की उनकी इच्छाशक्ति भी अन्यों की अपेक्षा कमजोर होती है।
पशुपति के बदन पर मौजूद कपड़े फटने लगे। उसके गले से निकलने वाली भेड़िये की चिंघाड़ उस क्षण दर्दनाक अलाप में तब्दील हो गयी, जब उसके जबड़े के किनारे के दांत नुकीले होकर मसूड़ों से बाहर आने लगे और नाखून चमड़े की परत फाड़कर नुकीली सूरत अख्तियार करने लगे। कई मिनटों की असहनीय यातना झेलने के बाद पशुपति के हलक से भेड़िये की गगनभेदी चिंघाड़ निकली और फिर महताबी रोशनी इस खौफ़नाक घटना की गवाह बनी कि किस तरह एक आम इंसान देखते ही देखते एक वहशतनाक नरभेड़िये में तब्दील हो गया था। ऐसा लगा था जैसे पशुपति की इंसानी खोल को फाड़कर वह दरिंदा बाहर आया था। उसका कद आठ फीट से ऊँचा था और बदन पर पशुपति के कपड़े चीथड़े की शक्ल में लटक रहे थे। हसीनाबाद से बेहद दूर उस जंगल में ये किंवदंती सच का रूप ले चुकी थी कि कुछ भेड़िये इंसान की खाल में छिपे होते हैं और पूनम की रात शिकार पर निकलते हैं।
पशुपति नीचे झुका, जहाँ एक कबाइली की लाश पड़ी हुई थी। संभवत: कुछ देर पहले ही उसने मानवीय काया में उस इंसान का शिकार किया था। उसने लाश के सिर को पकड़ा और धड़ से यूँ उखाड़ लिया, जैसे जमीन से कम गहरी जड़ों वाला कोई पौधा उखाड़ा हो। तत्पश्चात खून रिसते हुए उस सिर को कबाइलियों के समूह की ओर उछाल दिया।
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राजनगर, वर्तमान।
वह औरत, जो तबस्सुम की अम्मी हुआ करती थी, बेटी के स्कूलबैग में टाइम टेबल के मुताबिक़ नोटबुक्स और किताबें रख रही थी कि सहसा उसके हाथ थम गये। उसने एक नोटबुक उठाया तो जरूर लेकिन उसे बैग में रखने के बजाय गौर से देखने लगी। शायद उसे कुछ एहसास हुआ था। उसने नोटबुक पर लगा नेमस्लिप देखा और फिर तबस्सुम को आवाज़ दी, जो मेड से चोटियाँ गुंथवा रही थी।
“ये हसन वही है न, जो तुम्हारे लिए पेस्ट्रीज ले आया था?” तबस्सुम के आने के बाद उसने पूछा।
“हाँ..हाँ...वही है, अब क्या हुआ?” तबस्सुम ने मुँह बिचकाते हुए कहा।
“उसकी नोटबुक तुम्हारे पास क्यों?” औरत ने संजीदा लहजे में पूछा।
“ओफ्फो!” तबस्सुम ने माँ के हाथ से नोटबुक लेनी चाही लेकिन महिला ने अपना हाथ पीछे खींच लिया- “इसमें इतना गुस्सा होने की क्या बात है अम्मी। मैंने ही ली थी, राइम नोट करने के लिए। बाय मिस्टेक से बैग में रख लिया होगा, सिंपल।”
“इट्स नॉट अ सिंपल केस हनी।” औरत की आँखों में एक चमक उभरी और उसने नोटबुक के पन्नों, उसकी लिखावट पर यूँ हथेली फिराई, जैसे कुछ महसूस कर रही हो। उसने आँखें बंद कर लीं और फिर किसी सम्मोहन के सदके होंठों पर मंद-मंद मुस्कान नाचने लगी। तबस्सुम को भी मालूम था कि कभी-कभी उसकी माँ ऐसी हरकतें करती है लिहाजा खड़ी-खड़ी बोर होती रही। कुछ देर तक वह औरत नोटबुक के जरिये किसी अज्ञात औरा को अनुभूत करती रही तत्पश्चात आँखें खोल दीं और तबस्सुम की ओर लाड़ बरसाती निगाहों से देखते हुए बोली- “तुम्हारे उस फ्रेंड के लिए एक गुडन्यूज़ है।”
“तो क्या तुम उसे ये बताने के लिए तैयार हो कि मौत के बाद की दुनिया में रह रहे लोगों को सपनों में कैसे बुलाया जाता है?” तबस्सुम किलकित होती हुई बोली।
“हम्म।” औरत का लहजा संजीदा हो गया, उसकी मुस्कान भी लुप्त हो गयी- “मगर एक कंडीशन है।”
“कैसी कंडीशन?” तबस्सुम खुशी से उछलते-उछलते रह गयी।
“स्कूल ख़त्म होने के बाद उसे घर पर बुलाओ। उससे मिले बगैर, भला उसे इतना बेमिसाल इल्म कैसे दिया जा सकता है?” औरत ने रहस्यमयी लहजे में
कहा।
“वो आ जाएगा क्योंकि अपनी अम्मी को वह बहुत मिस करता है।”
“मैं वेट करूंगी। अब जाओ, तैयार हो जाओ।”
तबस्सुम वापस मेड के पास चली गयी जबकि औरत के होंठों पर व्याप्त मुस्कान कुटील होती चली गयी।
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