हिटलर पर देशद्रोह का मुकदमा

बीयर हॉल क्रांति के षड्यंत्र के बाद हिटलर पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाना हिटलर के राजनीतिक जीवन का अंत नहीं था; हालाँकि बहुत से लोगों का यही विचार था। कई तरह से देखा जाए तो यह उसके राजनीतिक जीवन की शुरुआत थी।

अखबारों में व्यापक प्रचार-प्रसार के कारण हिटलर रातोरात राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त व्यक्ति बन गया। बबेरियाई सरकार में एक नाज़ी समर्थक ने इस सनसनीखेज मुकदमे में न्यायाधीशों का चुनाव किया था। उसने हिटलर को यह छूट दे दी कि अगर वह चाहे तो अदालत के कमरे का इस्तेमाल प्रचार मंच के रूप में कर सकता है और अपने बचाव में जितनी देर चाहे उतनी देर बोल सकता है, किसी भी समय दूसरों को टोक सकता है और गवाहों से जिरह भी कर सकता है।

आरोपों से इनकार करने के बजाय हिटलर ने कबूल किया कि वह सरकार का तख्ता पलट देना चाहता था और उसने खुद को एक जर्मन राष्ट्रभक्त तथा लोकतांत्रिक सरकार, उसके संस्थापकों एवं नेताओं को वास्तविक अपराधियों के रूप में प्रस्तुत करते हुए इसके कारण भी बतलाए।

हिटलर की दृष्टि में वर्ष 1918 के देशद्रोही जर्मन राजनीतिज्ञ थे, जिन्हें वह तथाकथित ‘पीठ पर छुरा भोंकने’ के लिए जिम्मेदार समझता था, जिसके कारण विश्‍व युद्ध समय से पहले ही समाप्त हो गया और जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना हुई। हिटलर और अन्य बहुत से जर्मन लोगों का विचार था कि युद्धक्षेत्र में उनकी सेना हारी नहीं थी, बल्कि अंदरूनी राजनीतिक धोखेबाजी से उसे हराया गया था।

वास्तव में जर्मन सेना के नेताओं ने स्वयं मित्र राष्ट्रों से युद्ध समाप्त करने की बात चलाई थी, क्योंकि युद्ध में उन्हें पराजय नजर आ रही थी।

अखबारों में हिटलर का विवरण विस्तार से छपा। इस तरह जर्मनी की समस्त जनता को पहली बार हिटलर के व्यक्तित्व और उसके विचारों का परिचय प्राप्त हुआ। उसके बारे में जो कुछ सुना गया, बहुतेरे लोगों को पसंद आया।

24 दिन तक चली लंबी, ऊटपटाँग बहस के दौरान हिटलर की निर्भीकता बढ़ती गई। जैसे ही मुकदमे की काररवाई समाप्त हुई, हिटलर ने राष्ट्र के जनमानस पर पड़े अपने प्रभाव को महसूस करते हुए यह समापन वक्तव्य दिया—

‘‘जिस व्यक्ति का जन्म ही अधिनायक बनने के लिए हुआ हो, वह किसी के दबाव में नहीं आता। वह उसका अपना निर्णय होता है। उसे आगे बढ़ाया नहीं जाता, वह स्वयं आगे बढ़ता है। इसमें कुछ भी निर्लज्ज या धृष्टता की बात नहीं है। क्या किसी मजदूर को स्वयं को कठिन परिश्रम की ओर धकेलना धृष्टता है? किसी विचारक जैसे उच्च ललाटवाले किसी व्यक्ति का विश्‍व को कोई आविष्कार करके दिखाने तक रात-रात भर सोच-विचार करना क्या अहंकार कहलाएगा? जो व्यक्ति यह महसूस करता है कि उसे शासन करने के लिए बुलाया गया है, उसे यह कहने का कोई अधिकार नहीं है, ‘अगर आप मुझे चाहें या मुझे बुलाएँगे, मैं तभी सहयोग करूँगा।’ नहीं! उसका कर्तव्य बनता है कि वह आगे बढ़े। हमारी जो सेना है, जिसका हमने अभी-अभी गठन किया है, दिनोदिन बढ़ रही है। मैं इस गर्वीली आशा को पाले हुए हूँ कि एक दिन वह समय अवश्य आएगा, जब ये उजड्ड कंपनियाँ बढ़ते-बढ़ते बटालियन बन जाएँगी, बटालियन रेजीमेंट में तब्दील होंगी और रेजीमेंटों से बढ़कर डिवीजन बनेंगे, पुरानी कलगी कीचड़ से बाहर निकाली जाएगी, पुराने झंडे फिर लहराएँगे, पिछले दिव्य निर्णय में कोई समझौता होगा, जिसका सामना करने के लिए हम तैयार हैं। श्रीमान, हमारे बारे में फैसला देना आपका काम नहीं है। वह निर्णय तो इतिहास के चिरंतन न्यायालय का उद्घोष होता है। ...आप हमें हजार बार दोषी करार दें, इतिहास के चिरंतन न्यायालय की देवी मुसकराएगी और राज्य अभियोजक के दावों तथा अदालत के फैसले को तार-तार कर देगी, क्योंकि वह हमें निर्दोष मानती है।’’

अदालत ने उसे दोषी ठहराया। उसे आजीवन कारावास की सजा हो सकती थी। लेकिन हिटलर को पाँच साल की सजा दी गई, इस व्यवस्था के साथ कि वह छह माह में पैरोल पर रिहा किया जा सकता है।

मुकदमे के दौरान तीन न्यायाधीश इतने सहानुभूतिशील हो गए थे कि पीठासीन न्यायाधीश को हिटलर को दोषी ठहराने के लिए मनाना पड़ा। वे हिटलर को दोषी मानने के लिए इस शर्त पर तैयार हुए कि उसे जल्दी ही पैरोल पर रिहा कर दिया जाएगा।

असफल क्रांति के बाद गिरफ्तार किए गए अन्य नाज़ी नेताओं को भी हलके-फुलके दंड मिले। जनरल ल्यूडेंड्रॉफ को बरी कर दिया गया।

1 अप्रेल, 1924 को हिटलर को लैंड्सबर्ग के पुराने किले में ले जाया गया और उसे एक बड़े से निजी कमरे में रखा गया, जहाँ से सुंदर दृश्य नजर आता था। उसे उपहार मिले। उससे मुलाकात के लिए आनेवालों से अपनी इच्छानुसार मिलने की इजाजत उसे दे दी गई और उसके पास अपना निजी सचिव भी था, रुडोल्फ हैस।

क्रांति की विफलता के बाद नाज़ी पार्टी बिखर गई और असंगठित हो गई; लेकिन अखबारों के जरिए अपने विचारों को लोगों तक पहुँचाकर हिटलर का प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर बहुत बढ़ गया। जेल में रहने के बावजूद हिटलर ने बाहरी दुनिया से संपर्क बनाए रखा।

अपने प्रकोष्ठ में चहलकदमी करते हुए वह अपने विचार प्रकट करता रहता और उसका सचिव हैस उसके मुँह से निकला एक-एक शब्द नोट कर लेता। नतीजतन ‘मैन कैंफ’ नामक पुस्तक का पहला खंड तैयार हो गया, जिसमें हिटलर के राजनीतिक एवं जातीय विचारों की कड़वी सच्चाई को अत्यंत पेचीदा तफसील में प्रस्तुत किया गया, जिसे भावी कार्य-योजना के लिए एक पक्की रूपरेखा और विश्‍व के प्रति एक चेतावनी के रूप में ग्रहणीय माना जा सकता है।

एक नई शुरुआत

नौमाह तक जेल में रहने और अपनी गलतियों से सबक लेने के बाद एडोल्फ हिटलर वर्ष 1924 के क्रिसमस पर्व के कुछ दिन पहले आजाद हो गया। कारावास के दौरान हिटलर ने ‘मैन कैंफ’ पुस्तक की रचना करने के अलावा नवंबर 1923 की विफल नाज़ी क्रांति (बीयर हॉल पुत्श) और भविष्य के लिए उसकी उलझनों के बारे में काफी सोच-विचार किया था।

वह समझ गया कि जर्मन सेना तथा अन्य स्थापित संस्थाओं की सहायता लिये बिना लोकतांत्रिक सरकार को बलपूर्वक गद्दी से हटाने का प्रयास अकालिक था। उसने इस तरह की गलती दुबारा न करने का निश्‍चय कर लिया। अत: उसकी नाज़ी पार्टी के सदस्यों द्वारा युवा जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य के खिलाफ काररवाई करने की कोई भी दलील सफल नहीं हुई। वह उनके कहने पर ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहता था, जैसा नवंबर 1923 में उसने किया था और जिसके भयंकर परिणाम सामने आए थे।

हिटलर के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। उसने सोच लिया कि अगर सरकार को गिराना है और जर्मनी को अपने व नाज़ियों के अधीन करना है तो उसका एक ही तरीका हो सकता है कि लोकतांत्रिक नियमों को अपनाया जाए और चुनाव लड़ा जाए।

‘‘...आकस्मिक सबल आक्रमण द्वारा सत्ता हासिल करने की काररवाई के बजाय हमें अपना धैर्य बनाए रखना होगा और कैथोलिक एवं मार्क्सवादी सदस्यों के खिलाफ राइचस्टैग (जर्मन लोकसभा) में प्रवेश करना होगा। यदि उनको बंदूक की नोक पर बाहर करने के बजाय मतदान के जरिए पराजित करने में कुछ अधिक समय भी लगता है तो उसका नतीजा कम-से-कम उनके संविधान की व्यवस्था के अनुसार तो होगा। कोई भी कानूनी प्रक्रिया धीमी होती है। लेकिन देर-सबेर हमारा बहुमत होगा—और उसके बाद जर्मनी पर हमारा कब्जा।’’ हिटलर ने कहा, जब वह जेल में था।

नाज़ी पार्टी को सरकार की तर्ज पर ही गठित किया गया, ताकि जब सत्ता हाथ में आए और लोकतंत्र का अंत कानून के अनुरूप हो तो यह ‘प्रतीक्षारत सरकार’ तुरंत उसकी जगह ले सके।

किंतु, उनमें से कोई भी प्रक्रिया आरंभ करने से पहले हिटलर को कुछ समस्याओं का समाधान करना था। बीयर हॉल क्रांति के बाद बवेरिया जर्मन राज्य की सरकार ने नाज़ी पार्टी और उसके अखबार ‘वॉल्काइशर ब्योबैक्टर’ (जन प्रेक्षक) पर रोक लगा दी थी। इसके अलावा नाज़ी पार्टी बुरी तरह अव्यवस्थित थी। उसके नेताओं में अंदरूनी कलह थी।

सन् 1925 के प्रारंभ में हिटलर ने बवेरिया के प्रधानमंत्री से मुलाकात की और उसे सद्व्यवहार का वचन देकर प्रतिबंध हटाने के लिए राजी कर लिया और यह वादा भी किया कि नाज़ी समर्थक लोकतांत्रिक संविधान के नियमों के दायरे में काम करेंगे। फिर उसने अखबार के लिए एक लंबा संपादकीय ‘एक नई शुरुआत’ शीर्षक से लिखा, जो 26 फरवरी, 1925 को प्रकाशित हुआ।

27 फरवरी को नाज़ियों ने बीयर हॉल क्रांति के समय से अपनी पहली बड़ी सभा का आयोजन किया, जिसमें हिटलर ने नाज़ी पार्टी के सर्वमान्य नेता के रूप में अपना पद दुबारा ले लिया और कुछ चल रहे विवादों को सुलझा दिया। लेकिन 4,000 उल्लासित नाज़ियों के सामने दो घंटे के भाषण के दौरान हिटलर अपनी रौ में बहता चला गया और उसने लोकतांत्रिक गणराज्य, मार्क्सवादियों और यहूदियों के विरुद्ध वही पुरानी धमकियों का जहर उगलना शुरू कर दिया।

इसके परिणामस्वरूप बवेरिया सरकार ने उस पर सार्वजनिक रूप से बोलने पर दो वर्ष के लिए प्रतिबंध लगा दिया। हिटलर के लिए यह बड़ा झटका था, जो अपनी सफलता का अधिकतर श्रेय अपनी वक्तृत्व-कला को देता था। लेकिन उसकी हिम्मत नहीं टूटी और न ही उसके काम करने की रफ्तार कम हुई। हिटलर ने तत्काल नाज़ी पार्टी को पुनर्गठित करना शुरू कर दिया—पहले से भी ज्यादा फुरती के साथ।

नाज़ी पार्टी खुद दो बड़े राजनीतिक संगठनों में बँटी हुई थी—

राजनीतिक संगठन-1—जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य की जड़ खोदने और उसका तख्ता पलटने के लिए समर्पित।

राजनीतिक संगठन-2—गणराज्य के अंदर एक बहुत ही संगठित नाज़ी सरकार, अपनी बारी की प्रतीक्षा करनेवाली सरकार की अंतिम रूपरेखा तैयार करने की जिम्मेदारी सँभालना, ताकि किसी दिन वह सरकार की जगह ले सके। राजनीतिक संगठन-2 के अपने विभाग थे, जैसे कि कृषि, अर्थव्यवस्था, विदेश कार्य, प्रचार, न्याय और जाति तथा संस्कृति विभाग। नाज़ियों ने जर्मनी को 34 जिलों अथवा गाउए में विभाजित कर दिया। प्रत्येक जिले (गाऊ) का अपना एक गाउलाइटर अथवा नेता था। प्रत्येक जिले (गाउ) को भी हलकों में बाँट दिया गया, जिन्हें क्राइसे कहा जाता है और प्रत्येक हलके या इलाके का क्राइसलाइटर अथवा इलाका-नेता था। हलकों को ऑर्टस्ग्रपेन या स्थानीय गुणों में बाँट दिया गया। बड़े शहरों में स्थानीय गुणों को गलियों और ब्लॉकों के अनुसार विभाजित कर दिया गया।

युवा लोगों के लिए हिटलर जगेंड या हिटलर युवा समूहों का गठन किया गया। यह समूह 15 से 18 वर्ष तक की आयु के लड़कों के लिए था और इसे लोकप्रिय बाल स्काउट कार्यक्रमों के अनुसार बनाया गया था। 10 से 15 वर्ष तक के आयु-वर्ग के लड़के ड्यूत्शे जुंगलॉक में भरती हो सकते थे। लड़कियों के लिए भी एक संगठन था, जिसे बंड ड्यूत्शेर मैडेल कहते थे और महिलाओं के लिए बनाए संगठन का नाम फ्राउएंशेफ्टेन था।

उसी समय हिटलर ने एस.ए. अर्थात् अपनी समर्थक सेना, अपने नाज़ी तूफानी दस्तों को पुनर्गठित करना शुरू किया, जिनका जिक्र उसने ‘मैन कैंफ’ पुस्तक में इस प्रकार किया है—‘‘...आंदोलन के अपने जीवन-दर्शन संबंधी संघर्ष के संचालन एवं सुदृढ़ीकरण का एक साधन।’’

एस.ए. की शुरुआत सड़क छाप नाज़ी उपद्रवियों के एक संगठन के रूप में हुई, जिन्हें मूल रूप से ‘निगरानी सैनिक’ (मॉनीटर ट्रूप) कहा जाता था और जिनका काम इस बात पर नजर रखना था कि मार्क्सवादियों द्वारा नाज़ी सभाओं में गुल-गपाड़ा न किया जाए। वे गलियों-सड़कों में उनके साथ लड़ते-भिड़ते भी रहते थे। विफल क्रांति में यह संगठन भी हिटलर का मुख्य ‘हथियार’ रह चुका था।

जर्मन व्यक्ति की वरदी के लिए चाहत को महसूस करते हुए एस.ए. ने भूरे रंग की कमीजवाली पोशाक अपनाई, जिसके साथ बूट थे, स्वस्तिक वाले बाजूबंद, बैज और टोपी थी। स्वस्तिक चिह्न के साथ नाज़ी वरदी उनकी पहचान एवं दृश्यता का माध्यम बन गई और इस तरह लोगों के बीच पार्टी का अस्तित्व अधिक मुखर होने लगा।

उस समय एस.ए. के अंदर हिटलर ने एक नई अत्यंत अनुशासित गार्ड यूनिट का गठन किया। यह गार्ड यूनिट पूरी तरह उसके प्रति उत्तरदायी थी और उसके निजी अंगरक्षक के रूप में काम करता थीं। इसे शुट्ज्सूटाफेल, स्टाफ गार्ड या संक्षेप में एस.एस. कहा जाता था। एस.एस. ने काली वरदी अपनाई, जो कुछ-कुछ इतालवी फासिस्टों की वरदी से मिलती-जुलती थी। एक पूर्व लेखन-सामग्री विक्रेता जोसेफ बर्शटॉल्ड इसका पहला नेता बना। एक जवान आदमी, जिसने पार्टी के लिए तरह-तरह के काम लिये थे, 168वाँ सदस्य बना। उसका नाम था हेनरिक हिमलर। किंतु सारे प्रयासों के बावजूद नाज़ियों को एक बड़ी बाधा का सामना करना पड़ा, जिसके कारण पार्टी की सफलता सीमित हो गई। जर्मनी में हालात कुछ सुधरने लगे थे। अर्थव्यवस्था बेहतर हो रही थी और बेरोजगारी घट रही थी। जर्मनी के बड़े उद्योगपति ऋण-मुक्त थे। कारखानों का उत्पादन बढ़ रहा था, क्योंकि निवेश के लिए पूँजी संयुक्त राज्य से आ रही थी।

चार्ल्स जी. डवेस नामक एक अमेरिकी ने मित्र राष्ट्रों की मंजूरी से एक योजना बनाई थी, जिसे अमल में लाने से जर्मन युद्ध हरजाना (जर्मनी द्वारा प्रथम विश्‍व युद्ध में किए गए नुकसान की भरपाई के लिए चुकाई जा रही धनराशि) कम हो गया। ‘डवेस योजना’ ने जर्मन मुद्रा मार्क में स्थिरता कायम की। इस योजना के अंतर्गत जर्मन उद्योग को पुन: खड़ा करने हेतु बड़े ऋण देने की भी व्यवस्था थी। जर्मन सरकार ने भी अमेरिका से ऋण लिया, ताकि अनेक नए सामाजिक कार्यक्रमों और नगर-पालिका की निर्माण परियोजनाओं, जैसे कि विमान-क्षेत्रों, खेल-कूद के मैदानों अर्थात् स्टेडियम और तरणताल आदि के लिए भी वित्त व्यवस्था की जा सके।

जर्मनी का नया राष्ट्राध्यक्ष पॉल वॉन हिंडेनबर्ग नाम का उनींदी आँखोंवाला एक वृद्ध भद्र पुरुष था, जो प्रथम विश्‍व युद्ध में फील्ड मार्शल के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुका था। अनुदार (कंजर्वेटिव) और मध्य मार्गी राजनीतिक दलों ने गणराज्य में स्थिरता लाने और राष्ट्रपति की गद्दी अति-सुधारवादी (रेडिकल) दलों के हाथों में जाने से बचाने के उद्देश्य से उसका एकमत होकर समर्थन किया था।

जर्मन सेना ने नवोदित गणराज्य के साथ शांति समझौता कर लिया था। हालाँकि वर्सेलिस संधि की शर्तों के अनुसार 1,00,000 से अधिक सैनिक रखने और आधुनिक उपकरण एवं विमान हासिल करने की मनाही थी, फिर भी सेना द्वारा प्रदत्त धनराशि के बूते पर चल रहे अल्प-आवृत्त अर्ध-सैनिक संगठनों में हजारों लोग मौजूद थे। जर्मन जनरल स्टाफ, जिसे उक्त संधि द्वारा भंग कर दिया गया था, ने अपने सैनिकों को उनके भेस में छिपा रखा था। सेना भी, गुप्त रूप से, रूसी कारखानों में नई टेक्नोलॉजी विकसित करने में लगी हुई थी और रूसी सेना के साथ सैनिक अभ्यास कर रही थी।

इस प्रकार, मित्र राष्ट्रों के समक्ष पेशी के बावजूद जर्मन जनरल स्टाफ और उसकी सेना को अपना प्रमुख लक्ष्य, आत्म-संरक्षण और तरक्की हासिल करने की छूट थी और यही कारण था कि उसने फिलहाल जर्मन लोकतंत्र का समर्थन किया।

आर्थिक दृष्टि से हालत सुधरने के साथ-साथ जर्मन लोगों ने कुछ राहत महसूस की। चूँकि जीवित रहने के लिए अब उन्हें कमर-तोड़ मेहनत करने की आवश्यकता नहीं थी, उनके पास अब इतना समय था कि अपना मन-बहलाव कर सकें, बाहर जाकर मनोरंजन कर सकें, कलाओं में हिस्सा ले सकें और बीयर बार तथा कॉफी हाउसों के इर्द-गिर्द बैठ सकें। उन लोगों में एडोल्फ हिटलर के नाम से चेहरों पर मुसकराहट आ जाती, शायद वे हिटलर और महान् फिल्मी हास्य अभिनेता चार्ली चैपलिन में समानता पाते थे। चार्ली चैपलिन हिटलर जैसा दिखता था और दोनों की अंग-भंगिमा भी एक जैसी थी।

इस सबके बीच एडोल्फ हिटलर जान गया कि उसकी पार्टी को अभी रुक-रुककर कदम बढ़ाना होगा, क्योंकि पार्टी के आरंभिक सदस्यों में अभी बहुत से असंतुष्ट लोग थे। हिटलर को यह बोध भी था कि अच्छा समय ज्यादा देर नहीं रहेगा। जर्मन गणराज्य उधार के पैसों और उधार के समय पर जी रहा था। अंतर्निहित राजनीतिक एवं जातीय तनाव, जिनका वह फायदा उठाना चाहता था, अभी मौजूद थे; यद्यपि निष्क्रिय थे और जब अच्छा समय बीत जाएगा, वे फिर उसकी तलाश करेंगे। लेकिन फिलहाल उसे इंतजार करना होगा।