फाह्याज़ ने उसकी बातें गौर से सुनीं, फिर कुछ देर तक मनन करते हुए ये समझने की कोशिश करता रहा कि उसके इस व्यवसायिक भागदौड़ का उसके साथ जुड़े वाकये से कोई सम्बन्ध हो सकता है या नहीं, लेकिन जब जेहन को ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं सूझा तो उसने पूछा- “तुम्हारे वालिद का इंतकाल कैसे हुआ था?”
“जब मैं बैचलर ऑफ़ फाइन आर्ट का स्टूडेंट हुआ करता था तब एक रात अचानक उन्हें दिल का दौरा पड़ गया था, जबकि उनकी सेहत अच्छी थी, उससे पहले उन्हें एक भी अटैक नहीं आया था।”
“क्या उनके साथ भी वो शाप जुड़ा हुआ था, जो तुम्हारे साथ जुड़ा हुआ है?”
“शायद हाँ क्योंकि कभी-कभी अब्बा बहुत गमज़दा हो जाते थे तो अम्मी उन्हें समझाती थीं। मैंने कई बार उन्हें अपनी बनाई हुई पेंटिंग को जलाते हुए भी देखा था।”
“यानी कि वे भी तुम्हारी तरह परेशान थे और तुम्हें विरासत में सिर्फ उनकी चित्रकारी ही नहीं बल्कि उनकी वह परेशानी भी मयस्सर हुई है।”
“शायद।” कामरान ने कंधे उचकाए।
“अपनी अम्मी के बारे में कुछ बता सकते हो?”
“साधारण औरतों जैसी ही थीं। उनके बारे में काबिल-ए-जिक्र बात बस इतनी है कि वे खुले विचारों की थीं। घूमना उनका शौक था। उन्हें अतीत से जुड़े रहना बेहद पसंद था। देश के मुगलकालीन इतिहास पर उनकी पकड़ लाजवाब थी। बादशाहों के ऐसे-ऐसे किस्से सुनाती थीं, जिनका जिक्र इतिहास के पन्नो में भी नहीं मिलता है। शायद उनका घुमंतू मिजाज ही उनके इस बेमिसाल इल्म का सबब था। अब्बा की ओर से कोई रुढ़ीवादी रोक-टोक न होना भी एक कारण था कि हिन्दुस्तान का ऐसा कोई कोना नहीं बचा था, जहाँ अम्मी के पाँव न पड़े रहे हों। वे ज्यादातर महाराष्ट्र और गुजरात जाया करती थीं।”
“उनका इंतकाल कब और कैसे हुआ था?”
फाह्याज़ का सवाल सुनकर कामरान ने चेहरे पर सख्त नागवारी का भाव लिए हुए उसे घूरा।
“मेरा मतलब है कि....।” फाह्याज़ ने आनन-फानन बात को संभाला- “ऐसा क्या हुआ था कि उन्हें...तुम्हारा...साथ...छोड़कर...कब्र...में जाना पड़ा?”
“ये साल भर पहले हुआ।” कामरान की तनी हुई भृकुटियाँ शिथिल पड़ीं और
उसने लम्बी साँस छोड़ते हुए कहा- “उनकी उम्र भी हो गयी थी और तमाम बीमारियों ने भी घेर लिया था उन्हें। एक रात वे सोईं तो अगली सुबह नहीं उठीं। लोग आये, बोले कि उनका इंतकाल हो गया है। सुनते ही मैं रो-रोकर पागल होने लगा। जिस प्यारी अम्मी की शोहबत में रहने के लिए मैंने पैसे कमाने के अच्छे-खासे मौके को लात मार दिया था, फानूस बनकर जिसकी हिफाजत करता रहा था, उस अम्मी का जाना मुझसे झेला नहीं जा रहा था। मुझे समझा-बुझाकर, दिलासा देकर लोगों ने उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया और चले गए लेकिन जल्द ही अम्मी के बिना घर मुझे काटने को दौड़ने लगा। सन्नाटापन मेरे कलेजे को कचोटने लगा। फिर एक मैंने फ़ैसला कर लिया कि अब मैं भी अम्मी के पास जाऊँगा। उस पल मैं अपने लिए फाँसी का फंदा बना रहा था, जब मुझे अचानक अम्मी की आवाज़ आयी।” फाह्याज़ के रोंगटे खड़े हो गए, जबकि कामरान एक ऐसे बच्चे की तरह बोलता रहा, जो अपने ख़ूबसूरत बचपन की गलियों में भटक गया हो- “मेरे हाथ से फाँसी का फंदा खुद ब खुद छूट गया। अम्मी की आवाज़ ने मुझे इतना डांटा, जितना कब्र में जाने से पहले अम्मी भी कभी नहीं डांटी थीं। उसी दरम्यान उनकी आवाज़ ने मुझे बताया कि उनका जिस्म पुराना हो गया था और तकलीफों की पनाहगाह बन गया था, इसलिए उन्हें उसे कब्र के हवाले करना पड़ा जबकि हकीकत में वे अब भी रूहानी सूरत में मेरे साथ हैं। अम्मी की बात सुनकर मैंने खुदकुशी का इरादा मुल्तवी कर दिया और पहले की तरह जिंदगी गुजारने की कोशिश करने लगा। पर ये कोशिश भी इतनी आसान नहीं थी। अम्मी का रूहानी रूप में साथ होना भी उनकी कमी को पूरा नहीं कर सकता था।”
“तो इस कमी को पूरा करने के लिए तुमने रास्ता ये निकाला कि हर शाम उनकी कब्र पर जाने लगे, उनसे बातें करने लगे और उनके साथ खाना खाने लगे?”
फाह्याज़ के निष्कर्ष पर कामरान ने मौन सहमति दी।
“हद है यार।” सुबोध बड़बड़ाया। कामरान की बात ख़त्म होने तक वह दो
बार जम्हाई ले चुका था जबकि फाह्याज़ बड़ी मुश्किल से इस बात के लिए खुद को रोक पाया था कि उसके मुँह से कामरान के विश्वास को ठेस पहुँचाने वाला कोई शब्द न निकल पाए।
“सो कॉल्ड आसमानी आफ़त ने तुमसे जो-जो तस्वीरें बनवाई हैं, वो तुम्हारे पास अब भी हैं?” कुछ देर बाद सुबोध ने पूछा।
“जी हाँ।”
“उन्हें दे दो। हमें जरूरत पड़ सकती है।”
कामरान उठा और रोल की हुई कई पेंटिंग्स लाकर उनके सामने रख दिया। सुबोध ने गिना, वे संख्या में छ: थे। हर रोल पर नंबर डाला गया था।
“ये रही विनायक की पेंटिंग।” उसने छ: नंबर वाला रोल उठाकर फाह्याज़ की ओर बढ़ा दिया।
फाह्याज़ ने उसे खोला। तस्वीर वाकई विनायक की ही थी और इतनी स्पष्ट थी कि लगता था चित्रांकन के वक्त वह कामरान के सामने ही बैठा हुआ था जबकि कामरान का दावा था कि वह उससे कभी रूबरू नहीं हुआ था। पेंटिंग देखने के बाद सुबोध का ये यकीन और पुख्ता हो गया कि वह झूठ बोल रहा था।
“इन तस्वीरों को लेकर और कुछ बताना चाहते हो?” फाह्याज़ ने पूछा- “कुछ ऐसा, जो हमारे काम आ सकता है?”
“शायद हाँ।” और फिर कामरान ने पाँच नंबर का रोल उठाकर फाह्याज़ को थमा दिया।
“कुछ ख़ास है इसमें?” कहने के साथ ही फाह्याज़ ने रबर निकालकर उस रोल को खोला लेकिन पेंटिंग पर नजर पड़ते ही उसके समूचे बदन में रोमांच भर गया। उसकी आँखें हैरत से फ़ैल गयीं और होंठ थरथराने लगे। उसकी हालत देख जब सुबोध ने तस्वीर में झाँका तो पहले फाह्याज़ की भांति हैरान हुआ फिर कामरान की ओर देखा, जिसे अभी तक ये एहसास नहीं हो पाया था कि उस पेंटिंग ने सामने बैठे लोगों पर क्या प्रभाव डाला है।
“क्या ख़ास है इस पेंटिंग में?” सुबोध ने सख्त स्वर में पूछा।
“विनायक की पेंटिंग से ठीक पहले मैंने ये पेंटिंग बनाई थी, अंदाजतन बारह से पंद्रह महीने पहले।”
“ये कोई ख़ास बात नहीं है।” सुबोध के लहजे की सख्ती और बढ़ गयी।
“ख़ास बात ये है कि शायद मेरे साथ जुड़ी आसमानी आफ़त ने तस्वीर वाली औरत को जल्द ही मार दिया था क्योंकि इस औरत के केस में मुझे केवल चार दिन ही नरभेड़िया का सपना आया था। शायद चार दिन में ही वह औरत....।”
कामरान ने आगे का वाक्य अधूरा छोड़ दिया।
“य...ये नहीं हो सकता...।” फाह्याज़ से अब खामोश नहीं रहा गया, उसके हाथ से पेंटिंग छूट गयी- “ये कैसे हो सकता है?”
“स...सर को...क..क्या हुआ?” कामरान हड़बड़ाया।
सुबोध कुछ कहने के बजाय उसे घूरता रहा।
“आप लोग कुछ बोलते क्यों नहीं?”
“जो पेंटिंग तुमने बनाई है, वो सर की वाइफ मिसेज शबनम बानो की है।”
कामरान जड़वत् रह गया।
“तुम जानते थे शबनम को?” फाह्याज़ ने पूछा- “तुमने देखा था कभी उसे?”
“जवाब आप जानते हैं सर, फिर भी पूछ रहे हैं? तस्वीर वाली मोहतरमा तो राह चलते भी कभी मेरी निगाहों से नहीं गुजरी थीं।”
“ये क्या गोरखधंधा चल रहा है।” फाह्याज़ ने सिर थाम लिया।
“शायद अब आप यकीन करेंगे कि ये जो कुछ हो रहा है, उसमें कोई आसमानी दखल है। ये किसी इंसान का काम हो ही नहीं सकता है।”
ये पहली बार हुआ जब सुबोध को कामरान की दलीलों पर सिर पीटने का मन नहीं हुआ।
“मगर शबनम का क़त्ल नहीं हुआ था। उसकी मौत दुर्घटना में हुई थी।” फाह्याज़ ने कामरान से मुखातिब होकर कहा।
“तभी तो मुझे आदमभेड़िए के सपने भी आने जल्द ही बंद हो गए। शायद आसमानी आफ़त से पहले दुर्घटना ने ही मैडम की जान ले ली।”
“तुम बाकी चार पेंटिंग्स को चेक करो सुबोध।”
सुबोध ने किया मगर इस बार उन चारों में से कोई भी पेंटिंग जान-पहचान वाले की नहीं निकली।
“क्या तुम बता सकते हो कि ये लोग देश के किस हिस्से से जुड़े हो सकते हैं?” सुबोध, कामरान से मुखातिब हुआ- “या फिर कोई ऐसा क्लू, जिसे हम बतौर फ़िल्टर इस्तेमाल करके इन लोगों की फाइलें निकाल सकें?”
“मैं..मैं माफीनामे के साथ कहता हूँ सर कि मैं नहीं बता सकता। जो बता सकता था, पहले ही बता चुका हूँ। मैं तो....मैं तो ख्वाब में भी नहीं सोच सकता था कि इंस्पेक्टर साहब भी मेरी मनहूसियत का शिकार हुए हो सकते हैं।”
फाह्याज़ कुछ देर तक खामोश बैठा रहा फिर उठकर बाहर निकल गया। उसके पीछे सुबोध ने पेंटिंग्स के सारे रोल को समेटा और कामरान से कहा- “अगर किसी भी पल तुम्हें इन मामलों से जुड़ी कोई भी जानकारी याद आये या कहीं से हासिल हो तो हमें बताना मत भूलना। और हाँ, अगर अपनी अजीबोगरीब सनक के तहत आगे तुमने कोई और खूनी पेंटिंग बनाई तो ये बात भी तुरंत हमारे संज्ञान में आनी चाहिए।” कामरान ने सहमति में सिर हिला दिया तो उसने आगे कहा- “हमारी इजाजत बगैर ये ठिकाना छोड़ने की कोशिश मत करना। और अगर संभव हो तो अपनी अम्मी के मामले में किसी साइकोलॉजिस्ट की कंसल्टेंसी लो क्योंकि कब्र में लेटे लोग खाना नहीं खाते, किसी से बातें नहीं करते, जानते हो क्यों...?” कामरान खामोश रहकर उसे घूरता रहा जबकि उसने आगे कहा- “क्योंकि वे मर चुके होते हैं।”
कहने के बाद सुबोध ये जानने के लिए वहाँ रुका नहीं कि उसकी टिप्पणी ने कामरान को नाराज कर दिया है। वह मुड़ा और बूटों की भारी आवाज़ से खामोशी को भंग करते हुए बाहर निकल गया।
बाहर फाह्याज़ एक गुमटी के पास खड़ा सिगरेट के कश लगा रहा था। हालाँकि वह चेन स्मोकर नहीं था लेकिन इस भ्रम का शिकार जरूर था कि गहरे तनाव के क्षणों में एकाध सिगरेट पी लेने से जेहन को सुकून मिलता है।
“स्मोकिंग इज इंजीरियस टू हेल्थ। इट काजेस कैंसर।” सुबोध उसके पास पहुँचा- “हर फिल्म की शुरूआत में परदे पर ये लाइन लिखी हुई आती है।”
फाह्याज़ ने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की। शून्य को घूरते हुए और कश लगाते हुए वह ख्यालों में गुम रहा। इस बीच सुबोध ने गुमटी वाले को सिगरेट का भुगतान किया फिर उससे मुखातिब होकर बोला- “शायद अब हमें कब्रिस्तान चलना चाहिए, चौकीदार से ये जानने के लिए कि इस चित्रकार का मानसिक रोग असल में किस लेवल का है। दिमाग का दही कर दिया इसने तो।”
“तुम अकेले होकर आओ, मुझे किसी रेस्टोरेंट या कैफेटेरिया के पास ड्रॉप कर दो। मैं कुछ देर अकेले रहना चाहता हूँ।”
फाह्याज़ उस दिशा में आगे बढ़ गया, जिस दिशा से चलकर वे यहाँ तक आये थे।
“इतना सीरियस होने जैसी बात भी नहीं है सर।” सुबोध भी उसके साथ कदमताल करते हुए बोला- “हो सकता है ये झूठ बोल रहा हो। इसने मैडम को कहीं देखा हो या.....।” थोड़ी देर रुककर उसने कहा- “या फिर मैडम ही कभी इसके पास अपनी पेंटिंग बनवाने के लिए आयी रही हों।”
“ऑन रिकॉर्ड, विनायक का केस क्लोज कर दीजिए।” फाह्याज़ ने सुबोध की टिप्पणी को नजर अंदाज करके कहा- “उसकी मानसिक हालत ठीक नहीं थी और दस दिन से वह सिजोफ्रेनिक हुआ पड़ा था। सो गफ़लत में उसने खुद को ही मार डाला। कामरान उसका करीबी दोस्त था, जो उस रात खैरियत पूछने के लिए उसे फोन कर रहा था।” सुबोध ने उसे अविश्वास के भाव से देखा तो उसने आगे जोड़ा- “अब ऐसे घूर क्या रहे हो? हम कोई नया काम करने जा रहे हैं क्या?”
“देर-सबेर होना तो यही है सर लेकिन....।”
“लेकिन?”
“अगर यही करना है तो मुझे कब्रिस्तान क्यों भेज रहे हैं? मैं इन लोगों की पेंटिंग्स क्यों ढो रहा हूँ, जो शायद मर चुके हैं।”
“क्योंकि...।” फाह्याज़ ने सिगरेट का टोटा फेंका और सुबोध की ओर मुड़कर कहा- “हम केस को ऑफिसियली क्लोज कर रहे हैं, अनऑफिसियली नहीं।”
“समझ गया, आप इस मामले को लेकर पर्सनल हो चुके हैं।”
“तो क्या मुझे नहीं होना चाहिए?” सुबोध जब खामोश होकर उसे देखता रहा तो उसने आगे कहा- “उस कामरान ने विनायक की तस्वीर बनाई, विनायक मर गया, उसने मेरी बीवी की तस्वीर बनाई और मेरी बीवी भी मर गयी। हाँ...हाँ...मैं जानता हूँ कि वो एक एक्सीडेंट था लेकिन सपने मुझे आते हैं सुबोध, तुम्हें नहीं। तुम्हें लग रहा होगा कि कामरान इज प्लेइंग अ ट्रिक लेकिन मुझे नहीं क्योंकि मुझे भी आया है वह सपना। कोई कितना भी बड़ा ट्रिक मास्टर क्यों न हो, किसी को सपने में अपनी प्लान के मुताबिक चीजें नहीं दिखा सकता।”
“तो अब आप किसी बाबा के पास जाएंगे?”
“नहीं, मैं बस तथ्यों और तर्कों का दामन थामकर इस अँधे कुंएं में और गहराई तक उतरना चाहता हूँ ताकि इसकी तह में छिपे सच तक पहुँच सकूँ। मुझे किसी बाबा, तांत्रिक, अघोरी, पीर या फ़कीर की जरूरत नहीं है, मैं सिर्फ तुम्हारा साथ चाहता हूँ। मैं उस रहस्यमयी कातिल तक पहुँचना चाहता हूँ, जिसने मेरी शबनम के साथ-साथ उन लोगों का भी शिकार किया है, जिनका कोई कसूर नहीं था। फिर वो कातिल कोई आसमानी आफ़त हो या इंसानी, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।”
बातें करते-करते वे जीप तक पहुँच गये। सुबोध ने उन पेंटिग्स को सीट पर रखा और फाह्याज़ से मुखातिब होकर कहा- “तो बताइए, हम शुरूआत कहाँ से करें?”
“ये जिन लोगों की पेंटिंग्स हैं, उनकी केस फाइल्स तलाशने की कोशिश करो। ये देश के किसी भी हिस्से के वाशिंदे हो सकते हैं।”
“हासिल क्या होगा हमें, भूत का ठिकाना?”
“नहीं। अगर इनकी केस डिटेल्स हमें पता चल गयीं तो हम उस पैटर्न को फिगर आउट कर सकते हैं, जिसके जरिये वह एंटिटी अका आसमानी आफ़त कामरान को हिप्नोटाइज करके किसी पार्टिकुलर शख्स की पेंटिंग बनवाती है। एक बार पैटर्न हमारे हाथ लग गया तो हम कामरान के तस्वीर बनाने से पहले ही एंटिटी के अगले विक्टिम तक पहुँच सकते है और उसे प्रोटेक्ट करके एंटिटी को
ओवरटेक कर सकते हैं। आई मीन चेन को ब्रेक कर सकते हैं।”
“पर इतने लोगों की केस डिटेल हम निकालेंगे कैसे? ये वास्तविक दुनिया है सर, किसी सैटेलाइट चैनल का क्राइम शो नहीं।”
“आई थिंक इनमें से किसी एक की भी जानकारी मालूम हो जाना एनफ़ होगा क्योंकि शबनम और कामरान का केस आलरेडी हमारे पास है। तीन से चार केसेज की स्टडी करके कोई न कोई सुराग तो मिलेगा ही।”
“लेकिन ये भी भूसे के ढेर में सुई ढूँढने के बराबर होगा। चूँकि हम इस केस को अब ऑफ रिकॉर्ड डील करेंगे इसलिए डेटाज को एक्सेस करने की हमारी अथॉरिटी भी लिमिटेड होगी। कुछ केसेज में हमें सीनियर की तो कुछ में कोर्ट की परमिशन भी चाहिए हो सकती है। अगर ये सब-कुछ किसी तरह हो भी गया तो भी हमारा काम आसान नहीं होगा क्योंकि ढूंढे जाने वाले लोगों के नाम तक नहीं पता हैं हमें।”
“उस सिगिल की बाबत तमाम मालूमात आपको इतनी जल्दी कैसे हासिल हो गयी थी?”
“उसके लिए मैंने स्पेशल एफर्ट किया था। एक ग्राफिक आर्टिस्ट से मैंने लाश से बरामद उस निशान की फेयर इमेज ड्रा करवाई थी और फिर उस इमेज को गूगल लेंस के जरिये इंटरनेट पर ढूंढा था। गूगल लेंस की ये खासियत होती है कि वह किसी भी इमेज से मिलती-जुलती जितनी भी इमेजेज इंटरनेट पर होती हैं, उन्हें आपके सामने ला देता है, बशर्ते कि जिस सोर्स से गूगल हमें उक्त सामग्री परोसेगा, उस पर कोई सिक्योरिटी बैरियर न लगा हो।”
“फिर तो आपका काम कुछ हद तक आसान हो गया। आप उसी ग्राफ़िक आर्टिस्ट से कांटेक्ट कीजिए और इन पेंटिंग्स को ऐसी इमेजेज में कन्वर्ट करवाइए कि लगे कि ये कैमरे से ली गयी तस्वीरें हैं। जहाँ तक मुझे अंदाजा है, आप सीधे-सीधे इन पेंटिंग्स को स्कैन करके सर्च करेंगे तो परिणाम मिलने मुश्किल हैं क्योंकि इनसे मिलते-जुलते पेंटिंग्स इंटरनेट की दुनिया में मौजूद होने से तो रहे।”
“हम्म।” सुबोध ने हुंकार भरी- “ये ट्रिक कम कर सकती है। मैं कोशिश करता हूँ, हालाँकि आर्टिस्ट इस काम के लिए अच्छी खासी फीस ले लेगा।”
“कोई बात नहीं। मैं सारा खर्च वहन करने के लिए तैयार हूँ।”
“अगर आप चाहें तो हम फिफ्टी-फिफ्टी पर काम कर सकते हैं।” सुबोध हँसा फिर सहसा उसे कुछ याद आया- “हमें किसी आर्टिस्ट के पास जाने की क्या जरूरत है, जब ये सारा फसाद ही एक आर्टिस्ट का शुरू किया हुआ है।”
“कामरान आर्टिस्ट है, कोई ग्राफ़िक डिज़ाइनर नहीं।”
“शायद आप भूल गये, उसने बताया था कि ग्राफ़िक डिजाइनिंग में
सर्टिफिकेट किया हुआ है।”
“तो फिर फोन करके यहाँ बुलाओ उसे।”
“अभी नहीं क्योंकि रूपांतरण के लिए उसे इन पेंटिंग्स को स्कैन करने की जरूरत पड़ेगी और मुझे नहीं लगता कि उसके पास हाई क्वालिटी का स्कैनर होगा। हम उसे स्कैन्ड तस्वीरें मेल कर देंगे।”
“ये भी ठीक है। अब मुझे कहीं ड्रॉप करो और कब्रिस्तान के चौकीदार से मुलाक़ात करके आओ। मैं तुम्हारा वेट करूँगा।”
“श्योर सर।” सुबोध ने कहा और ड्राइविंग सीट पर सवार हो गया।
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