नाज़ी पार्टी का नेता—हिटलर

सन् 1921 तक एडोल्फ हिटलर विशाल जन-समूहों के सामने बोलने में अत्यंत प्रभावशाली हो गया था। फरवरी में हिटलर ने म्यूनिख में लगभग 6,000 लोगों की भीड़ को संबोधित किया। सभा का प्रचार करने के लिए उसने दो ट्रक भरकर पार्टी समर्थकों को स्वस्तिक चिह्न लिये हुए नगर में घूम-घूमकर हलचल मचाने और इश्तहार फेंकने के लिए भेजा। यह पहला मौका था, जब नाज़ियों ने इस युक्ति का प्रयोग किया।

हिटलर वर्सेलिस संधि, विरोधी राजनीतिज्ञों और राजनीतिक गुटों, विशेषकर मार्क्सवादियों एवं सदैव यहूदियों के खिलाफ हुल्लड़बाजी और कभी-कभी पागलों की तरह उत्तेजनापूर्ण लंबी बकवास करने के लिए नाज़ी पार्टी के बाहर कुख्यात हो रहा था।

नाज़ी पार्टी म्यूनिख में केंद्रित थी, जो अतिवादी दक्षिणपंथी जर्मन राष्ट्रवादियों का अड्डा बना हुआ था। उनमें सेना अधिकारी भी शामिल थे, जो मार्क्सवाद को कुचलने और बर्लिन में केंद्रीभूत युवा जर्मन लोकतंत्र को कमजोर करने या उसका तख्ता पलट देने के लिए कमर कसे हुए थे।

धीरे-धीरे वे एडोल्फ हिटलर में एक बढ़ते हुए राजनीतिज्ञ को देखने लगे और नाज़ी आंदोलन के बढ़ते प्रभाव में उन्हें अपने पाँव जमाए रखने का अवसर दिखाई देने लगा। हिटलर स्वयं इस फिक्र में था कि वह अपने आंदोलन को शेष जर्मनी में किस तरह फैलाए और आगे बढ़ाए। वर्ष 1921 की ग्रीष्म ऋतु में उसने राष्ट्रवादी गुटों से मिलने के लिए बर्लिन की यात्रा की।

उसकी अनुपस्थिति में म्यूनिख में उसकी अपनी ही नाज़ी पार्टी के नेताओं के बीच अप्रत्याशित विद्रोह हो गया।

पार्टी का संचालन अभी तक एक कार्यकारिणी समिति द्वारा किया जा रहा था, जिसके मौलिक सदस्य हिटलर को अत्यंत रोबीला और तानाशाही चलाने वाला मानते थे। हिटलर की स्थिति कमजोर करने के उद्देश्य से उन्होंने ऑगस्बर्ग के समाजवादियों के एक गुट के साथ गठबंधन कर लिया।

हिटलर तुरंत म्यूनिख वापस आया और उसने 11 जुलाई, 1921 को पार्टी से इस्तीफे की घोषणा करके उन्हें जवाब दे दिया।

वे समझ गए कि अगर हिटलर अलग हो गया तो नाज़ी पार्टी खत्म हो जाएगी। हिटलर ने मौके की नब्ज पकड़ ली और घोषणा कर दी कि वह सिर्फ एक शर्त पर वापस आएगा कि उसे चेयरमैन बनाया जाए और निरंकुश शक्तियाँ प्रदान की जाएँ।

पार्टी के संस्थापक सदस्य एंटन ड्रेक्सलर सहित अन्य सभी गुस्साए समिति सदस्य पहले तो अड़े रहे। इसी बीच में एक गुमनाम इश्तहार नजर आया, जिसका शीर्षक था—‘क्या एडोल्फ हिटलर तानाशाह है?’ इसमें हिटलर पर सत्ता-लोलुप होने का आरोप लगाया गया था और उसकी निंदा की गई थी कि अब वह हिंसा का सहारा लेनेवाले लोगों से घिरा रहता है। हिटलर ने म्यूनिख के एक अखबार में इसके प्रकाशन के खिलाफ मानहानि का मुकदमा ठोक दिया और फैसला उसके पक्ष में रहा, जिसके अंतर्गत कुछ हरजाने का भुगतान कर मामला रफा-दफा कर दिया गया।

नाज़ी पार्टी की कार्यकारिणी समिति ने आखिरकार अपना अड़ियल रवैया छोड़ दिया और हिटलर की माँगों को पार्टी-सदस्यों के बीच मतदान के लिए प्रस्तुत किया गया। हिटलर के पक्ष में 543 वोट पड़ेे और सिर्फ 1 वोट उसके खिलाफ पड़ा।

29 जुलाई, 1921 को हुई अगली सभा में एडोल्फ हिटलर को नाज़ी पार्टी का फ्यूहरर (नेता) घोषित कर दिया गया। यह पहला अवसर था, जब आम सभा में उसे इस उपाधि से संबोधित किया गया।

मदिरालय में रची क्रांति

सन् 1921 और 1923 के बीच अनेक वित्तीय घटनाएँ प्रकाश में आईं और उनके मद्देनजर नाज़ियों का हौसला बहुत बुलंद हो गया, यहाँ तक कि उन्होंने हिटलर को जर्मनी पर अधिकार जमाने के लिए उकसाया।

अप्रैल 1921 में प्रथम विश्‍व युद्ध के विजयी यूरोपियन मित्र राष्ट्रों, विशेषकर फ्रांस एवं इंग्लैंड, ने जर्मनी को एक बिल प्रस्तुत किया, जिसमें जर्मनी से युद्ध में हुए नुकसान के लिए हरजाने की माँग की गई थी; क्योंकि युद्ध की शुरुआत जर्मनी द्वारा की गई थी। युद्ध से हुई तबाही के उपरांत मरम्मत एवं सुधार कार्य के लिए इस बिल (33 अरब डॉलर) का जर्मनी की अर्थव्यवस्था पर बहुत असर पड़ा। मुद्रास्फीति ने अर्थव्यवस्था का भट्ठा बिठा दिया।

जर्मन मुद्रा मार्क का मूल्य एकदम बहुत नीचे आ गया। युद्ध का हरजाना घोषित किए जाने तक 4 मार्क 1 अमेरिकी डॉलर के बराबर थे। फिर मार्क का मूल्य घटकर 1 डॉलर के मुकाबले 75 मार्क हो गया और 1922 में इसके मूल्य में इतनी गिरावट आई कि 1 डॉलर 400 मार्क का हो गया। जर्मन सरकार ने अदायगी को स्थगित करने की माँग की। फ्रांस ने इनकार कर दिया। जर्मनी ने हरजाने की अदायगी रोककर उनकी खिलाफत की। इस काररवाई के बदले में फ्रांस की सेना ने जनवरी 1923 में जर्मनी के औद्योगिक क्षेत्र रूहर पर कब्जा कर लिया।

जर्मन मार्क का मूल्य गिरते-गिरते 1 डॉलर की तुलना में 18,000 तक जा पहुँचा। जुलाई 1923 में 1 डॉलर के मुकाबले 1,60,000 मार्क चुकाने पड़े। अगस्त में मार्क का मूल्य डॉलर की तुलना में 10,00,000 मार्क और नवंबर 1923 में 40,00,000 मार्क तक नीचे जा पहुँचा।

जर्मन लोगों की जीवन-भर की बचत मिट गई। वेतन का भुगतान जिस मुद्रा में किया जा रहा था, उसका कोई मूल्य ही नहीं था। पंसारी की दुकान से कुछ भी खरीदने के लिए करोड़ों-अरबों मार्क देने पड़ते थे। नतीजा यह हुआ कि भुखमरी के कारण दंगे भड़क उठे।

कुछ समय तक तो लोगों ने फ्रांस का हुक्म न मानने के लिए अपनी सरकार का साथ दिया। लेकिन सितंबर 1923 में जर्मन सरकार ने हरजाने की अदायगी फिर शुरू करने का विनाशकारी निर्णय लिया। लोगों में रोष और असंतोष की लहर दौड़ गई, जिसका फायदा उठाते हुए अतिवादी राजनीतिक गुटों ने बिगड़ती हालत को और बिगाड़ने तथा जर्मनी को अराजकता के कगार पर ला खड़ा करने का काम किया।

नाज़ियों तथा अन्य ऐसे ही गुटों ने सोचा कि वार करने का यही सही वक्त है। बवेरिया का जर्मन राज्य नाज़ियों का पनाहगाह और बर्लिन में बैठी लोकतांत्रिक सरकार की खिलाफत करनेवाले गुटों का अड्डा था। नवंबर 1923 तक नाज़ियों के समर्थकों की संख्या 55,000 हो चुकी थी और यह अब तक का सबसे बड़ा एवं सर्वाधिक संगठित गुट था। नाज़ी पार्टी के सदस्य काररवाई की माँग कर रहे थे और हिटलर जानता था कि उसे अपेक्षित कदम उठाना होगा या अपनी पार्टी का नेतृत्व हाथ से जाने का खतरा मोल लेना होगा।

हिटलर और नाज़ियों ने मिलकर यह साजिश रची कि वे बवेरियाई सरकार के नेताओं का अपहरण करेंगे और बंदूक की नोक पर उन्हें हिटलर को अपना नेता स्वीकार करने के लिए बाध्य कर देंगे। फिर, अपनी योजना के अनुसार, वे प्रथम विश्‍व युद्ध के ख्याति-प्राप्त सेनापति ऐरिक ल्यूडेंड्रॉफ की मदद से जर्मन सेना को अपने पक्ष में कर लेंगे, राष्ट्रव्यापी विद्रोह की घोषणा कर देंगे और बर्लिन में जर्मन लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता पलट देंगे।

जब उन्हें पता चला कि म्यूनिख के एक बीयर हॉल (मदिरालय) में बड़ी तादाद में व्यापारी लोग इकट्ठा होने जा रहे हैं और उस सभा में बवेरिया के वही नेतागण खास मेहमान होंगे, जिनका अपहरण वे करना चाहते हैं तो उन्होंने अपनी योजना को कार्यरूप में परिणत करने का फैसला कर लिया।

8 नवंबर, 1923 को हरमन गोरिंग के निर्देशन में समर्थक सैनिकों ने उस जगह को घेर लिया। शाम 8.30 बजे हिटलर और उसका तूफानी दस्ता बीयर हॉल में घुस गया और वहाँ अफरा-तफरी मच गई।

हिटलर ने छत में एक गोली दागी और सकते में पड़ गई भीड़ पर चिल्लाया, ‘‘खामोश’’।

हिटलर और गोरिंग रास्ता चीरकर जबरन मंच पर पहुँच गए और उनके समर्थक सशस्त्र सैनिक हॉल में बराबर दाखिल होते रहे। राज्य आयुक्त गुस्ताव वॉन कॉहर, जिसका भाषण शोर-शराबे के कारण बीच में रुक गया था, ने हिटलर के लिए मंच छोड़ दिया।

हिटलर ने चिल्लाकर कहा, ‘‘राष्ट्रीय क्रांति का बिगुल बज गया है। कोई भी हॉल से बाहर नहीं जाएगा। अगर तुरंत सब लोग शांत नहीं हुए तो मैं गैलरी में मशीनगन लगवा दूँगा। बवेरियन और राइक* सरकारों को हटा दिया गया है और एक कामचलाऊ राष्ट्रीय सरकार बना दी गई है। राइकस्बेहर (जर्मन सेना) और पुलिस बैरकों पर कब्जा कर लिया गया है। सेना और पुलिस स्वस्तिक ध्वज के साथ नगर की सड़कों पर गश्त लगा रही है।’’

कोई भी बात सच नहीं थी, लेकिन बीयर हॉल में मौजूद लोगों के पास इसके विपरीत कुछ जानने का कोई चारा नहीं था।

तत्पश्‍चात् हिटलर ने बवेरिया सरकार के तीन शीर्षस्थ अधिकारियों को पीछे के एक कमरे में जाने का हुक्म दिया। राज्य आयुक्त कॉहर, राज्य पुलिस के प्रमुख कर्नल हंस वॉन सैसर और बवेरिया में जर्मन सेना के कमांडर जनरल ऑटो वॉन लसाव ने वही किया जैसा उन्हें कहा गया था। वे उस कमरे में चले गए जहाँ हिटलर ने उन्हें बताया कि उन्हें नाज़ी क्रांति की घोषणा करने में उसका साथ देना होगा और नई सरकार का हिस्सा बनना होगा।

लेकिन हिटलर को आश्‍चर्य हुआ, जब उसके तीनों बंदियों ने सिर्फ उसको नजरें गड़ाकर देखा और शुरू में उससे बात करने से भी मना कर दिया। हिटलर ने उनका साहस देखकर उन पर पिस्तौल तान दी और चिल्लाते हुए बोला, ‘‘मेरी पिस्तौल में चार गोलियाँ हैं। उनमें से तीन आपके लिए हैं, श्रीमान। आखिरी गोली मैंने अपने लिए रखी है।’’

किंतु, पिछले कमरे में क्रांति का नाटक हिटलर के मन-मुताबिक नहीं चला। फिर अचानक आवेश में आकर हिटलर तेजी के साथ कमरे के बाहर चला गया और वापस मंच पर पहुँचकर चिल्लाया, ‘‘घोषणा की जाती है कि नवंबर अपराधियों की सरकार और राइक राष्ट्रपति को हटा दिया गया है। म्यूनिख में आज ही एक नई राष्ट्रीय सरकार का गठन किया जाएगा। जर्मन राष्ट्रीय सेना के नाम से तत्काल एक नई सेना बनाई जाएगी। अस्थायी जर्मन राष्ट्रीय सरकार का काम उस ऊँची इमारत बाबेल बर्लिन पर धावा बोलना और जर्मन लोगों को बचाना है। कल जर्मनी में आप या तो राष्ट्रीय सरकार देखेंगे या हमें मरा हुआ पाएँगे।’’

यह सुनकर मदिरालय में मौजूद सभी लोगों को यकीन हो गया कि पीछे के कमरे ने गए व्यक्तियों में हिटलर के आगे घुटने टेक दिए हैं और वे नाज़ियों का साथ देने जा रहे हैं। सबने हिटलर की जबरदस्त वाहवाही की।

उसके बाद जनरल ल्यूडेंड्रॉफ का आगमन हुआ। हिटलर को पता था कि पिछले कमरे में मौजूद तीनों व्यक्ति उसकी बात जरूरत सुनेंगे।

हिटलर के कहे अनुसार ल्यूडेंड्रॉफ ने उस कमरे में जाकर तीनों व्यक्तियों से बात की और उन्हें नाज़ी क्रांति में शामिल होने की सलाह दी। न चाहते हुए भी वे मान गए और फिर बाहर आकर उन्होंने मंच पर चढ़ने के बाद लोगों से मुखातिब होते हुए हिटलर के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया और नई सरकार के साथ वफादारी का वादा किया।

भावुकता से भरे हिटलर ने जन-समूह को इस प्रकार संबोधित किया, ‘‘पाँच साल पहले जब मैं एक अंधे-अधमरे मरीज की हालत में सेना अस्पताल में पड़ा हुआ था, उस समय मैंने खुद से जो वादा किया था, उस वादे को मैं आज पूरा करने जा रहा हूँ—कि मैं तब तक आराम नहीं करूँगा और न ही शांति से बैठूँगा, जब तक कि नवंबर अपराधियों को समाप्त नहीं कर दिया जाता, जब तक कि वर्तमान फटेहाल जर्मनी के अवशेषों पर पुन: एक शक्तिशाली, गौरवपूर्ण, स्वतंत्र और शानदार जर्मनी की नई इमारत खड़ी नहीं हो जाती।’’

बीयर हॉल में मौजूद लोगों ने गर्जना के साथ अपनी मंजूरी दे दी। हिटलर खुशी से फूला नहीं समा रहा था। उसके लिए यह विजय की रात थी। शायद वह वास्तव में जर्मनी का नया नेता हो सकता था।

लेकिन तभी खबर आई कि कई सैनिक बैरकों पर कब्जा करने की कोशिश विफल हो गई है और यह कि उन बैरकों में मौजूद जर्मन सैनिक नाज़ी तूफानी दस्तों का मुकाबला करने पर डटे हुए हैं। हिटलर ने बीयर हॉल से चले जाने और मौके पर पहुँचकर स्वयं स्थिति सँभालने तथा समस्या को हल करने का निश्‍चय किया।

बीयर हॉल छोड़कर जाना भारी भूल थी। उसकी गैर-हाजिरी में नाज़ी क्रांति की असलियत जल्दी ही सामने आ गई। बवेरिया सरकार के तीनों नेताओं कॉहर, लसाव एवं सैसर को अच्छा मौका मिल गया और वे ल्यूडेंड्रॉफ से यह झूठा वादा करके बीयर हॉल से निकल गए कि वे हिटलर के प्रति वफादार रहेंगे।

हिटलर को बैरकों में जमकर बैठे जर्मन सैनिकों को काबू करने और उनके हथियार डलवाने में कामयाबी नहीं मिली। उस कोशिश में विफल होकर वह वापस बीयर हॉल चला गया।

बीयर हॉल में वापस आने पर अपनी क्रांति के मंसूबे को बिखरते देख वह हैरानी में पड़ गया। अगले दिन बर्लिन पर धावा बोलने की कोई योजना नहीं थी। म्यूनिख पर भी कब्जा नहीं किया जा रहा था। कुछ भी नहीं हो रहा था।

असल में, अर्नस्ट रॉहम और उसके समर्थक सैनिकों ने केवल एक इमारत पर कब्जा जमाया था—युद्ध मंत्रालय में, सेना मुख्यालय पर। अन्यत्र नाज़ी ठगों के जत्थे म्यूनिख नगर में कुछ राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार करते और यहूदियों को परेशान करते घूम रहे थे।

9 नवंबर की सुबह होते ही कमिश्‍नर कॉहर ने हिटलर तथा ल्यूडेंड्रॉफ से किया अपना वादा तोड़ दिया और हिटलर की पोल खोलते हुए एक वक्तव्य जारी किया, ‘‘मुझसे, जनरल लसॉव और कर्नल वॉन सैसर से बंदूक की नोक पर हासिल की गई घोषणाएँ बेमानी हैं। अगर क्रांति की मूर्खतापूर्ण एवं उद्देश्यहीन चेष्टाएँ सफल हो गई होतीं तो म्यूनिख और उसके साथ-साथ बवेरिया भी गर्त में धँस गया होता।’’

कॉहर ने नाज़ी पार्टी और उसके लड़ाकू दस्तों को भी विघटित करने का हुक्म जारी कर दिया।

जनरल लसॉव ने भी हिटलर का साथ छोड़ दिया और म्यूनिख में नाज़ी विद्रोह का दमन करने के लिए अतिरिक्त सैन्य बल भेजने का हुक्म दिया। बुलाए गए अतिरिक्त सैनिकों ने सुबह तक युद्ध मंत्रालय भवन और उसमें कब्जा करने वाले रॉहम तथा उसके समर्थक सैनिकों की घेराबंदी कर दी।

हिटलर सारी रात विकलता से इस उधेड़-बुन में लगा रहा कि अब क्या किया जाए। जनरल ल्यूडेंड्रॉफ ने तब उसे एक उपाय सुझाया। नाज़ी सैनिक म्यूनिख के बीचोबीच सिर्फ कूच करेंगे और उस पर कब्जा कर लेंगे। ल्यूडेंड्रॉफ ने समझाया कि उसकी प्रथम विश्‍व युद्ध की प्रसिद्धि के कारण किसी को भी उस पर गोली चलाने का साहस नहीं होगा। उसने हिटलर को यह भी भरोसा दिलाया कि पुलिस और सेना भी उनका साथ देगी। निराशोन्मत्त हिटलर को यह विचार, यह प्रस्ताव भा गया।

9 नवंबर की सुबह 11 बजे के आस-पास हिटलर, गोरिंग और ल्यूडेंड्रॉर्फ के नेतृत्व में 3,000 नाज़ियों का दस्ता म्यूनिख के केंद्र की ओर बढ़ने लगा। उनमें हेनरिक हिमलर नाम का एक युवा पार्टी सदस्य था, जिसके हाथ में झंडा था।

म्यूनिख के केंद्र में पहुँचने के बाद नाज़ी युद्ध मंत्रालय भवन की ओर बढ़ने लगे; लेकिन पुलिस ने उनका रास्ता रोक लिया। जब वे करीब 100 सशस्त्र पुलिस-कर्मियों के आमने-सामने खड़े थे, हिटलर ने चीखकर उनको समर्पण करने के लिए कहा। उन्होंने समर्पण नहीं किया। गोलियाँ चलीं। दोनों तरफ से गोली-बारी हुई। करीब एक मिनट तक यही हुआ। 16 नाज़ी और 3 पुलिसवाले मारे गए। गोरिंग के उरूमूल (ग्रॉइन) में गोली लगी। हिटलर का कंधा उतर गया, क्योंकि जिस आदमी से वह उलझा हुआ था, उसके गोली लगी और वह गिरते समय हिटलर को भी साथ लिये पटरी पर लुढ़क गया था।

हिटलर का अंगरक्षक अलीरच ग्राफ हिटलर को बचाने के लिए कूदकर उसके ऊपर आ गया और कई गोलियाँ उसके शरीर में लग गईं। फिर हिटलर पटरी के सहारे-सहारे रेंगते हुए गोलीबारी के दायरे से बाहर हो गया और प्रतीक्षारत एक कार में सवार हो गया तथा अपने साथियों को पीछे छोड़कर चला गया। शेष नाज़ी कार्यकर्ता या तो बिखर गए या पकड़ लिये गए। ल्यूडेेंड्रॉर्फ अपने वीरोचित व्यक्तित्व के अनुरूप चलती गोलियों के बीच से होकर पुलिस तक पहुँच गया और फिर उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

हिटलर छिपते-छिपाते अपने दोस्त हंपस्तेंग्लो के घर पहुँच गया, जहाँ उसे समझा-बुझाकर खुदकुशी के बारे में सोचने से रोका गया। वह बहुत निराश हो गया था और सरकार के इशारे पर उसे जल्दी ही गोली से उड़ा दिया जाना था। उसने दो रातें हंपस्तेंग्लो की परछत्ती में छिपकर गुजारीं। तीसरी रात पुलिस आ पहुँची और उसे गिरफ्तार करके ले गई। उसे लैंड्सबर्ग स्थित जेल में पहुँचा दिया गया जहाँ उसकी जान में जान आ गई, जब उसे बताया गया कि उस पर खुलेआम मुकदमा चलाया जाएगा।

नाज़ी क्रांति की योजना विफल हो जाने के बाद अधिकतर पर्यवेक्षकों का विचार था कि हिटलर के राजनीतिक जीवन और इसके साथ ही नाज़ी आंदोलन का भी बड़े ही धमाकेदार और हास्यास्पद ढंग से अंत हो गया है।