हिटलर का जर्मन कामगार पार्टी में शामिल होना

कॉरपोरल हिटलर को सितंबर 1919 में म्यूनिख में एक छोटे से दल की जाँच-पड़ताल करने का काम दिया गया। उस दल का नाम ‘जर्मन कामगार पार्टी’ था।

‘कामगार’ शब्द के प्रयोग ने जर्मन सेना का ध्यान खींचा, जो मार्क्सवादी विद्रोहियों को कुचलने में लगी हुई थी।

12 सितंबर को हिटलर ने आम लोगों की तरह कपड़े पहने और जर्मन कामगार पार्टी की एक सभा में चला गया। यह सभा म्यूनिख बीयर हॉल के एक पिछले कमरे में हो रही थी और उसमें करीब पच्चीस लोग मौजूद थे। हिटलर ने वहाँ अर्थशास्त्र पर गॉटफ्राइड फेडर का एक व्याख्यान सुना, जिसका शीर्षक था, ‘कैसे और किन उपायों द्वारा पूँजीवाद को समाप्त किया जा सकता है?’

भाषण समाप्त होने के बाद हिटलर जब वहाँ से जाने की तैयारी में था, एक व्यक्ति उठा और उसने कहा कि जर्मनी का बवेरिया राज्य जर्मनी से अलग हो जाना चाहिए और उसे ऑस्ट्रिया के साथ मिलकर एक नए दक्षिणी जर्मन राज्य का गठन करना चाहिए।

यह सुनकर हिटलर क्रोधित हो गया और वह अगले पंद्रह मिनट तक, बिना रुके, उस व्यक्ति के खिलाफ बोलता रहा। इससे सभी अचंभे में पड़ गए। बताया जाता है कि जर्मन कामगार पार्टी के संस्थापकों में से एक ऐंटन डेकस्लर ने कानाफूसी की, ‘‘इस व्यक्ति में धारा-प्रवाह बोलने की योग्यता है। हम उसका इस्तेमाल कर सकते हैं।’’

हिटलर की भड़ास समाप्त होने के बाद ड्रेक्सलर जल्दी से उठकर हिटलर के पास गया और उसे चालीस पृष्ठ की एक पुस्तिका भेंट की, जिसका शीर्षक था—‘मेरी राजनीतिक जागृति’। उसने हिटलर से उसे पढ़ने का आग्रह किया और हिटलर को दुबारा आने का न्योता दिया।

अगले दिन सुबह-सुबह, जब वह द्वितीय इन्फैंट्री रेजीमेंट की बैरकों में अपने पलंग पर बैठा हुआ था और फर्श पर बिखरे रोटी के टुकड़े चूहों को खाते देख रहा था, हिटलर को उस पुस्तिका की याद आ गई और फिर वह उसे पढ़ने लगा। हिटलर को यह देखकर बड़ी खुशी हुई कि ड्रेक्सलर द्वारा लिखी गई पुस्तिका में वर्णित विचार उसकी अपनी सोच से काफी मिलते-जुलते थे—श्रमिक वर्ग के लोगों की एक मजबूत राष्ट्रवादी, सैन्य-समर्थक, सामी-विरोधी पार्टी बनाना।

कुछ ही दिनों बाद हिटलर को एक अप्रत्याशित पोस्टकार्ड प्राप्त हुआ, जिसमें लिखा था कि उसे पार्टी के एक सदस्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। उसे कार्यकारिणी समिति की एक बैठक में भाग लेने के लिए बुलाया गया था और वह उस बैठक में शामिल हुआ। उस बैठक में एक नए सदस्य के रूप में उसका हार्दिक स्वगात किया गया, हालाँकि वह अभी सच में निश्‍चय नहीं कर पाया था कि उस पार्टी में शामिल होना चाहिए या नहीं। हिटलर ने अपनी पुस्तक ‘मैन कैंफ’ में उस छल अर्थात् उस पार्टी का वर्णन इस प्रकार किया है—‘‘इने-गिने निर्देशों के अलावा वहाँ कुछ भी नहीं था, न कोई कार्यक्रम, न परचा, न छपी हुई कोई विषय-वस्तु, न सदस्यता कार्ड, और यहाँ तक कि कोई रबड़-मुहर भी नहीं थी।’’

हालाँकि जर्मन कामगार पार्टी की स्थिति से हिटलर प्रभावित नहीं था, फिर भी हिटलर को ड्रेक्सलर द्वारा व्यक्त यह भावना खींच लाई कि उनकी शुरुआत किसी तरह एक आंदोलन में बदल जाएगी, सिर्फ एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रहेगी। इस अव्यवस्थित पार्टी में हिटलर को अवसर नजर आया।

उसने दो दिन सोचने में लगा दिए और फिर जर्मन कामगार पार्टी की समिति में शामिल होने का निर्णय लिया और इस तरह राजनीति में उसका प्रवेश हुआ।

एडोल्फ हिटलर के पास कोई नियमित नौकरी नहीं थी और प्रथम विश्‍व युद्ध में बिताए समय को छोड़कर उसने लिंज में अपनी किशोरावस्था का सारा समय सोच-विचार करने में बिताया और वियना में वह जितने वर्ष रहा, उसने खाली बैठे रहने और गरीबी में जीने के सिवा कुछ नहीं किया। अत: कह सकते हैं कि उसने बड़ी आलस्यपूर्ण जीवन-शैली अपनाई हुई थी। लेकिन 1919 में, तीस साल की उम्र में, जर्मन कामगार पार्टी में शामिल होने के बाद हिटलर ने उसे सफल बनाने के लिए तत्काल ताबड़तोड़ कोशिश शुरू कर दी।

जर्मन कामगार पार्टी में मुख्यत: एक कार्यकारिणी समिति थी, जिसमें हिटलर को मिलाकर कुल सात सदस्य थे। नए सदस्यों को लाने के उद्देश्य से हिटलर ने निमंत्रण-पत्र बनाए, जो समिति के प्रत्येक सदस्य ने अपने मित्रों को बाँटे और उनसे पार्टी की मासिक आम सभा में शामिल होने का अनुरोध किया; लेकिन बहुत कम लोग आए।

अगली बार उन्होंने निमंत्रण-पत्र एक लेखन-सामग्री स्टोर से छपवाकर वितरित किए। कुछ लोग तशरीफ ले आए।

जब उन्होंने म्यूनिख में एक सामी-विरोधी अखबार में विज्ञापन दिया, तब हिटलर के आग्रह पर उन्होंने आम सभा का आयोजन करने के लिए एक बीयर गोदाम को चुना, जहाँ करीब सौ लोग आ सकते थे। समिति के अन्य सदस्यों को चिंता थी कि वह जगह शायद भर नहीं पाएगी; लेकिन 16 अक्तूबर, 1919 को आयोजित बैठक में सौ से अधिक लोग हिस्सा लेने पहुँचे।

हिटलर को उस सभा में पहले वक्ता के बाद बोलना था। यह पहला अवसर था, जब उसे एक विशिष्ट वक्ता के रूप में पेश किया जा रहा था। फिर भी समिति के कुछ सदस्यों को हिटलर की योग्यता के बारे में संशय था।

लेकिन जब हिटलर बोलने के लिए खड़ा हुआ, उसने बहुत ही भावनात्मक और कभी-कभी उन्मत्त होकर बोलने की अपनी शैली से हर किसी को अचंभित कर दिया। हिटलर के लिए उसके युवा राजनीतिक जीवन में यह एक महत्त्वपूर्ण क्षण था। उसने ‘मैन कैंफ’ में इस दृश्य का वर्णन इस प्रकार किया—

‘‘मैं तीस मिनट तक बोला और मैं इससे पहले जो कुछ भी अंदर महसूस किया करता था, यह जाने बिना कि वह है क्या, उस चीज की वास्तविकता सामने आ गई—मैं बोल सकता था! तीस मिनट के बाद उस छोटे से कमरे में मौजूद लोगों में बिजली-सी दौड़ गई और उनका उत्साह इस सच्चाई में प्रकट हुआ कि उनसे आत्म-बलिदान की मेरी अपील के फलस्वरूप चंदे में 300 मार्क की राशि प्राप्त हुई।’’

उस धन का उपयोग अधिक विज्ञापन खरीदने तथा इश्तहार छपवाने के लिए किया गया। जर्मन कामगार पार्टी ने अपनी सभाओं में हिटलर को मुख्य आकर्षण के रूप में प्रस्तुत किया। हिटलर ने अपने भाषणों में वर्सेलिस संधि के खिलाफ जहर उगला और सामी-विरोधी भाषणों की बौछार लगाते हुए उसने जर्मनी की सारी समस्याओं के लिए यहूदियों को दोषी ठहराया। सभाओं में उपस्थिति धीरे-धीरे बढ़ने लगी। सैकड़ों लोग जमा होने लगे।

वर्ष 1920 के आरंभ में पार्टी प्रचार की जिम्मेदारी हिटलर ने अपने ऊपर ले ली और फौज में रहते हुए जिन लोगों से उसका परिचय था, उन युवा लोगों को उसने पार्टी में भरती कर लिया। पार्टी के एक नए सदस्य कप्तान अर्नस्ट रॉहम, जिसने हिटलर की अंतत: प्रगति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, हिटलर के भरती अभियान में उसकी मदद की।

म्यूनिख में बहुत से अलग-थलग पड़े अव्यवस्थित सैनिक थे और भूतपूर्व सैनिक भी थे, जिनमें कुछ कर दिखाने की उत्कट चाहत थी तथा वर्सेलिस संधि से प्राप्त शांति तथा उसके फलस्वरूप स्थापित लोकतांत्रिक गणराज्य से उन्हें नफरत थी। वे अधिक-से-अधिक संख्या में जर्मन कामगार पार्टी में शामिल होने लगे।

अनेक दूसरे राजनीतिक दल भी सदस्यों की तलाश में थे, लेकिन मार्क्सवादियों से अधिक सफल कोई नहीं था। इसके चलते सच में एक भय व्याप्त था कि जर्मनी में रूसी क्रांति जैसी कोई व्यापक साम्यवादी क्रांति हो सकती है। हिटलर मार्क्सवाद को यहूदियों से जोड़कर देखता था और इसीलिए उसकी घोर निंदा करता था।

वह इस बात को भी समझता था कि साम्यवादी क्रांति का प्रत्यक्षत: विरोध करनेवाली कोई भी राजनीतिक पार्टी, किस तरह इतने अधिक जर्मन लोगों के भय को उकसाकर, उनका समर्थन पाने की कोशिश कर सकती है।

फरवरी 1920 में हिटलर ने जर्मन कामगार पार्टी को अपनी पहली जन-सभा का आयोजन करने के लिए कहा। पार्टी के प्रमुख सदस्यों ने उसके इस सुझाव का कड़ा विरोध किया, क्योंकि उनके विचार में इसके लिए अभी समय अनुकूल नहीं था और उन्हें यह भी डर था कि मार्क्सवादी उस सभा में विघ्न डाल सकते हैं। हिटलर को गड़बड़ी की कोई आशंका नहीं थी। वास्तव में वह तो इसे शुभ संकेत मानता था, यह जानते हुए भी कि इससे उसकी पार्टी पर मार्क्सवाद-विरोधी होने का धब्बा लग सकता है। उसने मार्क्सवादियों को चिढ़ाने के लिए हॉल को भी लाल रंग में सजवाया।

24 फरवरी, 1920 को हिटलर ने जब म्यूनिख में बड़े सभा भवन में प्रवेश लिया तो उसे यह देखकर बड़ी खुशी हुई कि वहाँ 2,000 लोग प्रतीक्षा में बैठे थे, जिनमें एक बड़ी संख्या साम्यवादियों की थी।

उसे बोलते हुए अभी कुछ मिनट ही हुए थे कि जर्मन कामगार पार्टी के समर्थक एवं विघ्न डालनेवाले साम्यवादियों के बीच लड़ाई-झगड़ा शुरू हो गया। उस शोर-शराबे में हिटलर की आवाज डूब गई। अंतत: हिटलर ने दुबारा बोलना शुरू किया और ‘मैन कैंफ’ में किए गए दावे के अनुसार, शोरगुल धीरे-धीरे तालियों की गड़गड़ाहट में दब गया।

उसने जर्मन कामगार पार्टी के पच्चीस सूत्रों, उसके राजनीतिक कार्यक्रम का वर्णन किया, जिसमें ये बातें शामिल थीं—एक बृहत्तर जर्मन राज्य में सभी जर्मन लोगों की एकता, वर्सेलिस संधि का रद्द किया जाना, जर्मन लोगों के लिए अतिरिक्त राज्य-क्षेत्र की माँग, नस्ल अर्थात् जाति के आधार पर नागरिकता का निर्धारण तथा किसी भी यहूदी को जर्मन नहीं मानना, काम किए बिना अर्जित सारी आय का जब्त किया जाना, राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था का पूर्णतया पुनर्गठन, जर्मन जाति को संकट में डालनेवाले धर्मों को छोड़कर धार्मिक स्वतंत्रता और एक सशक्त केंद्रीय सरकार, जो कानूनों को कारगार ढंग से लागू कर सके। हिटलर ने एक के बाद एक सभी पच्चीस सूत्रों का बखान किया और हर सूत्र पर उपद्रवी भीड़ की मंजूरी माँगी, जो उसे मिल गई। हिटलर की दृष्टि से सभा अत्यंत सफल रही।

हिटलर की समझ में एक बात आई कि आंदोलन का अपना कोई संकेत या ध्वज तो है ही नहीं, जो उसकी पहचान बन सके। वर्ष 1920 के ग्रीष्मकाल में हिटलर ने प्रतीक के रूप में स्वस्तिक का निशान चुना, जिसे आज तक के इतिहास में शायद सबसे अधिक हेय माना जाता है।

यह कोई ऐसा निशान नहीं था, जिसका आविष्कार हिटलर ने किया हो यह चिह्न तो प्राचीन युग के खँडहरों में भी पाया जाता है। हिटलर जब लंबाख, ऑस्ट्रिया में संत बेनीडिक्ट मठ द्वारा संचालित स्कूल में पढ़ने जाता था, तब वह रोजाना इस चिह्न को देखा करता था। वह प्राचीन मठ नक्काशीदार पत्थरों एवं काष्ठ कलाकृतियों से सजा हुआ था, जिनमें कई स्वस्तिक भी थे। ये स्वस्तिक चिह्न जर्मनी के आस-पास भाड़े के सैनिकों के बीच भी पाए गए थे और सामी-विरोधी राजनीतिक दलों ने भी पहले इनका प्रयोग एक प्रतीक के रूप में कियाथा।

लेकिन जब इसे लाल पृष्ठभूमि पर सफेद चक्र के अंदर रखा गया तो यह एक प्रभावशाली, तुरंत पहचाना जानेवाला प्रतीक बन गया और इससे हिटलर की पार्टी को तत्काल लोकप्रियता प्राप्त हुई।

हिटलर ने प्रतीकवाद की व्याख्या करते हुए कहा, ‘‘लाल पृष्ठभूमि आंदोलन की सामाजिक धारणा को व्यक्त करती है, धवल में राष्ट्रीय धारणा है, स्वस्तिक में आर्य पुरुष की विजय के लिए संघर्ष का लक्ष्य है और उसके साथ ही यह रचनात्मक कार्य संबंधी धारणा की सफलता को भी दरशाता है, जो सदा-सर्वदा सामी-विरोधी है और हमेशा सामी-विरोधी रहेगी।’’

जर्मन कामगार पार्टी का नाम हिटलर ने बदल दिया, क्योंकि वह उसमें राष्ट्रीय समाजवादी शब्दों को भी शामिल करना चाहता था। इस प्रकार, उसका पूरा नाम ‘राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन कामगार पार्टी (नाज़ी)’ हो गया।

वर्ष 1920 के अंत तक इस पार्टी की सदस्य-संख्या लगभग 3,000 हो गई थी।