ग़ज़ाली के उन पड़ोसियों ने, जो उसे देख चुके थे, उसकी तस्वीर देख कर इमरान के बयान की तस्दीक़ कर दी....फ़ैयाज़ ने उनसे बहुत-से सवाल किये, लेकिन वे उससे ज़्यादा न बता सके जो उन्होंने इमरान को बताया था।

‘‘अच्छा फ़ैयाज़ साहब....’’ इमरान ने थोड़ी देर बाद कहा। ‘‘अब तुम आर्टामोनॉफ़ के बारे में जानकारी हासिल करो और तुम अपनी मोटर साइकिल भी ले जा सकते हो।’’

‘‘आर्टामोनॉफ़ कौन है?’’

‘‘मेरा भतीजा है। तुम इसकी परवाह मत करो। ज़्यादा बोर मत करो, नहीं तो मैं स्विट्ज़रलैण्ड चला जाऊँगा।’’

फ़ैयाज़ से पीछा छुड़ा कर वह उन लोगों को तलाश करने लगा, जिन्होंने पिछले दिन सर तनवीर को ग़ज़ाली के दरवाज़े पर दस्तक देते देखा था।

उनमें से एक उसे जल्द ही मिल गया। इमरान दरअसल यह जानना चाहता था कि ग़ज़ाली से मुलाक़ात करने की कोशिश करने वालों में सर तनवीर के अलावा और कितने लोग थे। चूँकि इमरान भी पिछले दिन से यहाँ मौजूद था, इसलिए सर तनवीर का हवाला दे कर बातचीत आगे बढ़ाने में कोई परेशानी नहीं हुई और उसने बताया कि सर तनवीर के अलावा भी दो आदमी यहाँ आते थे, लेकिन उन्होंने कभी दरवाज़े पर दस्तक नहीं दी। वे बस दूर ही से कमरे की निगरानी किया करते थे। उनके हुलिये के बारे में वह सिर्फ़ इतना ही बता सका कि उनके चेहरों पर घनी काली दाढ़ी थी और आँखों पर काले शीशे की ऐनकें हुआ करती थीं।

‘‘मेक-अप!’’ इमरान धीरे से बड़बड़ाया।

फिर बस्ती से निकल कर उसने एक टैक्सी ली और सर तनवीर के दफ़्तर की तरफ़ चला गया।

सर तनवीर देश के बहुत बड़े बिज़नेसमैन थे और उनके दफ़्तर दुनिया के कई देशों में थे। उन तक पहुँचने के लिए इमरान को बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ा....बहरहाल, किसी-न-किसी तरह उसकी पहुँंच उन तक हो ही गयी। सर तनवीर ने नीचे से ऊपर तक उसे घूर कर देखा।

‘‘मैं महामारी का टीका लगाने के लिए नहीं आया।’’ इमरान बेवक़ूफ़ों की तरह बोल पड़ा।

‘‘क्या बात है?’’ सर तनवीर की गूँजती हुई आवाज़ से कमरे में झंकार-सी पैदा हुई।

‘‘ग़ज़ाली की लाश....ऐलफ़्रेड पार्क....कल रात!’’ इमरान इस तरह बोला, जैसे वह सर तनवीर से डरा हुआ हो।

‘‘क्या बकवास है?’’

इमरान जेब से ग़ज़ाली की तस्वीर निकाल कर मेज़ पर रखता हुआ बोला। ‘‘उसकी लाश।’’

‘‘तो मैं क्या करूँ?’’

‘‘सिर्फ़ आपकी इत्तला के लिए! वह अपने पड़ोसियों के लिए बड़ा रहस्यमय था और वे लोग उससे भी ज़्यादा रहस्यमय थे जो उसके लिए इस बस्ती के चक्कर लगाया करते थे।’’

‘‘हूँ!’’ सर तनवीर ने दोनों होंट भींच कर कुर्सी से टेक लगायी। उनकी आँखें इमरान के चेहरे पर थीं। ‘‘फिर?’’ उन्होंने थोड़ी देर बाद कहा।

‘‘उन गधों ने मुझे भी बीच में लपेट कर रख दिया है। हुआ यह कि आज मैं फिर वहाँ पहुँच गया। मुझे हालात मालूम नहीं थे। वे गधे शायद आपके बारे में पुलिस को बता रहे थे। गवाह के तौर पर उन्होंने मुझे पेश कर दिया। मगर भला मैं उन्हें कैसे बता देता कि वे आप थे। बस्ती में घुसते ही एक मज़दूर ने मुझे सारी बात बतायी। मैंने पुलिस को बताया कि एक शरीफ़ आदमी कार में ज़रूर आये थे, मगर मैं उन्हें पहचानता नहीं, अलबत्ता दूसरी बार देखने पर ज़रूर पहचान लूँगा। अब मेरी इज़्जत आपके हाथ में है।’’

‘‘क्यों तुम्हारी इज़्ज़त क्यों?’’

‘‘मैं दरअसल सरकारी डॉक्टर नहीं हूँ....बस, यह समझिए कि चार सौ बीस करके पेट पालता हूँ। हाँ, किसी ज़माने में एक प्राइवेट डॉक्टर का कम्पाउण्डर ज़रूर रह चुका हूँ। सादे पानी के मुफ़्त इंजेक्शन लगा कर लोगों पर अपनी अहमियत जताता हूँ, इसलिए कोई ख़ास ज़रूरत पड़ने पर लोग मेरे ही पास दौड़े आते हैं। मैं अपनी कमाई करता हूँ....जी हाँ....मगर अब शायद मेरी पोल खुल जायेगी। यह बहुत बुरा हुआ जनाब। अब आप ही मुझे कोई मशविरा दीजिए।’’

‘‘मशविरा....किसी वकील से लो....वक़्त हो चुका है....अब तुम जा सकते हो....! मगर ठहरो। तुम्हें ये तस्वीर कहाँ से मिली?’’

‘‘अब मैं क्या कहूँ! आप न जाने क्या सोचेंगे।’’

‘‘बताओ?’’ सर तनवीर गरजा।

‘‘मैं पुलिस से पीछा छुड़ा कर वापस आ रहा था कि पीपल वाली गली के मोड़ पर एक आदमी मिला। उसके चेहरे पर घनी काली दाढ़ी थी और आँखों में काले शीशों वाली ऐनक....उसने मुझे तस्वीर दे कर कहा कि यह ग़ज़ाली की तस्वीर है और उसकी मौत के ज़िम्मेदार सर तनवीर ही हो सकते हैं।’’

‘‘ब्लैकमेल करना चाहते हो मुझे?’’ सर तनवीर दाँत पीस कर बोले।

‘‘अरे तौबा-तौबा!’’ इमरान अपना मुँह पीटने लगा। ‘‘मैं जा रहा हूँ जनाब.... आइन्दा आप मेरी शक्ल न देखेंगे। मेरी चार सौ बीसी सिर्फ़ डॉक्टरी तक महदूद है और मैं ज़्यादा लम्बे हाथ मारने की कोशिश नहीं करता।’’

‘‘तुम्हें तस्वीर कहाँ से मिली थी?’’ सर तनवीर ने फिर अपना सवाल दोहराया।

‘‘मैंने हक़ीक़त आपको बता दी और हाँ, उसने यह भी कहा था कि सर तनवीर को फँसवा दो! मैं इस जुमले से समझ गया था कि आपका कोई दुश्मन आपको बेकार में परेशान करना चाहता है।’’

‘‘तुम क्या चाहते हो?’’ सर तनवीर ने थोड़ी देर बाद पूछा।

‘‘हक़ीक़त मालूम करना चाहता हूँ।’’

‘‘क्यों? तुम्हें इससे क्या सरोकार?’’

‘‘मैं दरअसल जासूसी कहानियाँ भी लिखता हूँ, हो सकता है कि मैं इससे कोई अच्छा-सा प्लॉट बना कर थोड़े-से पैसे ही कमा लूँ।’’

सर तनवीर कुछ पल इमरान को घूरते रहा। फिर मेज़ का दरा ज़खोल कर नोटों की एक गड्डी निकाली और उसे इमरान की तरफ़ फेंकते हुए बोले। ‘‘जाओ, अपनी ज़बान बन्द रखना! ये दस हज़ार हैं।’’

‘‘दस लाख पर भी लानत!’’ इमरान बिगड़ गया। ‘‘आप एक शरीफ़ आदमी को ब्लैकमेलर समझ रहे हैं....डॉक्टरी वाली चार सौ बीसी की और बात है। उसमें काफ़ी मेहनत, वक़्त और पैसा बर्बाद होता है, और इस तरह अपनी कमाई हलाल कर लेता हूँ, समझे जनाब.... लाहौल विला क़ूवत....मैं एक इज़्ज़तदार लेखक हूँ। अगाथा क्रिस्टी ने मेरे दर्जनों नॉवेलों का अंग्रेज़ी तरजुमा किया है।’’

‘‘तुम मेरा वक़्त बर्बाद कर रहे हो....रुपये उठाओ....और चलते बनो।’’

‘‘मैं हक़ीक़त मालूम करना चाहता हूँ! ग़ज़ाली कौन था? और आप जैसा बड़ा आदमी उसमें क्यों दिलचस्पी ले रहा था और यह तो मैं जानता हूँ, कि उसकी मौत में आपका हाथ नहीं है, वरना आप ख़ुद को सामने न आने देते।’’

‘‘मुझसे खुल कर बात करो। तुम कौन हो?’’ सर तनवीर ने आगे झुकते हुए धीरे से कहा।

‘‘मैंने अभी तक बन्द हो कर कोई बात नहीं की।’’

‘‘सी.बी.आई. के आदमी हो?’’

‘‘नहीं, मेरी शादी नहीं हुई। मैं किसी सी.बी.आई. को नहीं जानता।’’

सर तनवीर ने नोटों की गड्डी उठा कर फिर मेज़ के दराज़ में डाल ली और मेज़ पर रखी हुई घण्टी पर हाथ मारते हुए बोले। ‘‘अब चुपचाप चले जाओ....वरना चपरासी धक्के दे कर निकाल देगा।’’

घण्टी की आवाज़ के साथ ही चपरासी भी आ गया था।

‘‘आख़्ख़....अस्सलाम अलैकुम!’’ इमरान ने उठ कर न सिर्फ़ चपरासी को सलाम किया, बल्कि ज़बर्दस्ती हाथ भी मिलाने लगा और चपरासी बेचारा बुरी तरह बौखला गया। चपरासी ही नहीं, बल्कि सर तनवीर भी इस हरकत से परेशान हो गये थे।

‘‘चपरासी!’’ उन्होंने मुश्किल से फँसी-फँसी-सी आवाज़ निकाली, लेकिन इमरान तब तक जा चुका था।