लियाकत, मौलाना के सामने बैठे थे। उन्होंने उस सेलफोन को भी निकालकर आगे रख लिया था, जिसमें मुर्दाघर के आदमी के जरिये हासिल की गयी उस रहस्यमयी मोमिन की तस्वीर थी। तस्बीह के दाने फेर रहे मौलाना की आँखें बंद थीं और होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे। करीब दस मिनट बाद जाप पूरा करके उन्होंने आँखें खोलीं, तस्बीह को सिरहाने रखा और मसनद की टेक लेते हुए लियाकत को तवज्जो दी।

“अस्सलाम-उ-अलैकुम मौलाना साहब।” तवज्जो मिलते ही लियाकत ने फरमाया।

“वा अलैकुम अस्सलाम लियाकत मियाँ।” अभिवादन का जवाब देने के बाद मौलाना ने आगे कहा- “आने का सबब बयां करें।”

“एक तस्वीर को लेकर आपसे दरयाफ्त करनी थी।”

“बेटा दूसरे निकाह के लिए राजी हो गया क्या?” मौलाना ने दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए पूछा।

“मसला शादी-ब्याह का नहीं है मौलाना साहब, आज तो मैं एक दूसरा ही वाकया लेकर आपके सामने हाजिर हुआ हूँ।”

“दूसरा वाकया?” मौलाना की भाव-भंगिमा गंभीर हो गयी। वे मसनद का सहारा छोड़कर खुद के बुते बैठ गए और कमरे में किसी काम के वास्ते आये एक ताबेदार को चाय पेश करने का संकेत करके लियाकत से दोबारा मुखातिब हुए- “कैसा वाकया?”

“ठहरिए, बताता हूँ।” लियाकत ने रहस्यमयी मोमिन की तस्वीर ओपन करके सेलफोन मौलाना की ओर बढ़ा दिया- “पहले इस तस्वीर का दीदार कर लीजिए।”

“एक मौलाना से दिल्लगी कर रहे हैं लियाकत मियाँ?” मौलाना ने तस्वीर को गौर से देखने के बाद कहा- “कम-अज़-कम अल्लाह से तो खौफ खाइए।”

“दिल्लगी?” लियाकत हड़बड़ा गये- “कैसी दिल्लगी मौलाना साहब? ये एक तस्वीर ही तो है।”

मौलाना की मुखमुद्रा पहले से अधिक गंभीर हो गयी, कारण लियाकत को भी नहीं समझ में आया।

“आपको वाकई नहीं पता कि आप हमें क्या दिखा रहे हैं?” मौलाना ने सख्त लहजे में पूछा।

जब लियाकत ने जुबान से नहीं बल्कि गर्दन हिलाकर ‘नहीं’ में जवाब दिया तो मौलाना लम्बी-लम्बी साँसें लेते हुए अगल-बगल झाँकने लगे।

“आप अर्ज तो करें कि क्या गुस्ताखी हुई है हमसे।” लियाकत ने खुश्क गले से पूछा।

“ये तस्वीर झूठी है।”

मौलाना की घोषणा सुनते ही लियाकत के पैरों तले जमीन खिसक गयी। उन्होंने मौलाना के हाथ से मोबाइल लिया और उसमें अभी भी खुली पड़ी उस तस्वीर को गौर से देखा। वह रहस्यमयी मोमिन उसमें पहले की ही तरह ज्यों का त्यों नजर आ रहा था।

“मैं...मैं तो....मैं तो इस तस्वीर को लेकर आपसे बात करने आया था।” लियाकत ने जबरदस्ती हँसने की कोशिश की, ताकि मौलाना की नाराजगी का बायस बने बिना अपनी बात रख सके- “लेकिन आपने तो इस तस्वीर की बुनियाद को परखे ही बिना ही इसे झूठा करार दे दिया।”

“कहाँ था ये आदमी? किसने ली इसकी तस्वीर और क्यों ली?”

“ये सरकारी अस्पताल के मुर्दाघर में आया था।”

“मुर्दाघर में आया था?” मौलाना चौंके- “मगर क्यों?”

“एक लाश का मुआयना करने के लिए।”

“क्या बकवास कर रहे हैं आप?” अपनी भूरी आँखों में नायकीनी का भाव लिए हुए मौलाना ने लियाकत के हाथ से सेलफोन झपट लिया और उस मोमिन की तस्वीर को एक बार फिर गौर से देखने लगे। कुछ पलों तक उन्होंने उसका मुआयना किया फिर उसे लियाकत की ओर यूँ उछाल दिया, जैसे वह अचानक जलने लगा हो। अगर लियाकत ने सेलफोन लपका नहीं होता तो वह फर्श से टकराकर बिखर गया होता।

लियाकत ने जब मौलाना की ओर निगाहें उठाईं तो पाया कि वे आँखें बंद करके कोई दुआ पढ़ रहे थे। दुआ ख़त्म करने के बाद वे मुँह खोलने के बजाय बेचैनीपूर्वक पहलू बदलने लगे।

“आपकी हरकतें हमें खौफज़दा कर रही हैं मौलाना साहब।” लियाकत के चेहरे पर उलझनों का गहरा जाल बुन चुका था- “खुदा के लिए कुछ तो साफ़-साफ़ बताइए।”

“मुझे पूरी बात बताइए। ये आदमी मुर्दाघर क्यों आया था? वहाँ आकर किस बात की तफ्तीश कर रहा था? इसकी तस्वीर किसने ली? इसे रूबरू किसने देखा? ये तस्वीर आप तक कैसे आयी? और फिर आपको इसे लेकर मेरे पास आने की जरूरत क्यों सूझी?”

मौलाना के प्रश्नमाला के जवाब में लियाकत ने पूरी बात को सिलसिलेवार बयाँ कर दिया।

“तो....तो...ये मखलूक उस अजीबोगरीब निशान को देखकर कोई तसल्ली करने आया था?”

“और फिर तसल्ली करने के बाद कहा था कि जो हुआ है, नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हुआ है। अँधेरी दुनिया में एक नापाक शख्स रहता है, जो लगातार इंसानों पर हमला कर रहा है।” लियाकत ने विनायक की लाश पर बने उस निशान की भी इमेज ओपन करके मोबाइल मौलाना की ओर बढ़ाया- “यही है वो निशान।”

मौलाना ने मोबाइल थामा, निशान देखा।

“जिस लाश पर ये निशान पाया गया, उसकी बरामदगी फाह्याज़ के ही ज्यूरिडिक्शन में हुई है नतीजतन ये निशान उसके पास पहले से ही था। जिस रात उसे शबनम से ताल्लुक रखता डरावना ख्वाब दिखा था, उसकी अगली सुबह मैं उसके सेलफोन में इस निशान की तस्वीर को खुला देख इस नतीजे पर पहुँचा था कि उसका वह ख्वाब इस वाहियात निशान को मुसलसल देखते रहने के कारण आया था मगर जब मुर्दाघर का आदमी मुझसे मिला और अपने साथ पेश आये वाकये समेत मुझे ये भी बताया कि उसे भी बस थोड़े से फर्क के साथ आदमभेड़िये का वही ख्वाब आया था, जो फाह्याज़ को आया था तो मुझे ये दोनों बातें आपस में ताल्लुक रखती हुई लगीं लिहाजा आपसे मिलने की जरूरत महसूस हुई।”

“और वह थोड़ा सा फर्क ये था कि फाह्याज़ को शबनम और मुर्दाघर के आदमी को क़त्ल किया हुआ आदमी अपने-अपने लहू से आदमभेड़िये को नहलाते हुए नजर आये।”

“बिल्कुल मौलाना साहब।”

“अगर फाह्याज़ और मुर्दाघर के आदमी को ऐसे ख्वाब इसलिए आये क्योंकि एक निशान को लेकर दिमाग खपा रहा था और दूसरा उस निशान वाली लाश को उस रहस्यमयी मोमिन को दिखाया था या उस लाश की देखभाल कर रहा था तो इस बात की पूरी संभावना है कि ऐसा ही कोई ख्वाब हमें भी आये क्योंकि हम भी इस निशान को लेकर मगजमारी कर रहे हैं।”

“मेरे मन में भी यही ख्याल आया था इसलिए इसे परखने के लिए मैंने कल रात नींद के हवाले होने से पहले इस निशान को देखा, पूरी शिद्दत से इस पर दिमाग खपाया लेकिन फिर भी मुझे वैसा कोई ख्वाब नहीं आया।”

“तो इसका मतलब ये हुआ कि आदमभेड़िये का ख्वाब ये देखकर नहीं आता कि किसी के जेहन पर इस निशान का ख्याल तारी है या नहीं। ये ख्वाब केवल उन्हें आता है, जो किसी न किसी तरह उस निशान के नजदीक होते हैं। मसलन मुर्दाघर के आदमी को ख्वाब इसलिए आया क्योंकि वह निशान वाली लाश की देखभाल कर रहा था और उसे उस रहस्यमयी मोमिन के सामने दीदार के लिए पेश किया था। फाह्याज़ को वह ख्वाब इसलिए आया क्योंकि वह उस क़त्ल की तफ्तीश कर रहा है, जिसमें ये निशान सामने आया है।”

“लेकिन एक सवाल तो अब भी अपनी जगह बरकरार है मौलाना साहब।” लियाकत ने कुछ देर रुककर कहा- “मुर्दाघर के आदमी के ख्वाब में क़त्ल किया हुआ आदमी आया जबकि फाह्याज़ के ख्वाब में उसकी बीवी शबनम आयी, ये

फर्क क्यों?”

“आपके इस क्यों का तो एक ही जवाब हो सकता है कि कहीं न कहीं इस निशान का दखल शबनम की मौत में भी है।”

“ये..ये नामुमकिन है।” लियाकत की गर्दन सख्त इनकार के भाव से हिली- “शबनम की मौत तो महज़ एक दुर्घटना थी।”

“कैसी दुर्घटना?”

लियाकत ने बताया।

“जहाँ तक मैंने अखबार में पढ़ा था, अपार्टमेंट वाले आदमी का क़त्ल बड़े ही वहशियाना और रहस्यमयी ढंग से हुआ था। ये खबर भी छपी है कि विनायक नाम के उस आदमी की जेहनी हालत दुरुस्त नहीं थी। कुछ लोग ये तक कहने से बाज नहीं आ रहे हैं कि उसके क़त्ल में कोई आसेबी दखल है।” थोड़ी देर ठहरकर मौलाना ने पूछा- “क्या शबनम के साथ भी ऐसा कुछ था? मेरा मतलब कि उसकी जेहनी हालत ठीक तो थी? वह किसी नापाक आसमानी ताकत की चपेट में तो नहीं थी?”

“बिल्कुल नहीं।” लियाकत ने दृढ लहजे में कहा- “उसकी मौत महज़ एक हादसा थी, इस बात को पत्थर की लकीर समझें आप।”

“फिर तो मामला वाकई बहुत पेचीदा और खतरनाक है।” मौलाना ने गहरी साँस लेकर परेशान लहजे में कहा- “क्योंकि जिस रहस्यमयी मोमिन की तस्वीर के साथ आप यहाँ आये हैं, उसका इस मामले से जुड़ा होना और रहस्यमयी तरीके से क़त्ल किये हुए उस आदमी की लाश पर बने निशान में दिलचस्पी लेना; इस पूरे वाकये को हौलनाक बना रहा है।”

“ऐसा..ऐसा क्या है उस शख्स में?”

मौलाना जवाब देने की बजाय आँखों से लियाकत का हौसला तौलने लगे।

“आप बताते क्यों नहीं कि कौन है वह मोमिन?” लियाकत ने अधीर होकर पूछा।

“तो सुनिए लियाकत मियाँ।” मौलाना ने एकदम से कहा- “हकीकत ये है कि वह कोई मोमिन है ही नहीं। असल में वह एक जिन्न है।”

“ज...जिन्न....?” लियाकत को महसूस हुआ कि उनका बदन ठण्डा पड़ रहा है। उनकी आँखें हैरत से फ़ैल गयीं। गला शुष्क पड़ने लगा।

“हाँ, एक ऐसा मखलूक, जिसकी रगों में आग का दरिया बहता है और जिसकी हमारी ही तरह एक अलग दुनिया है।”

“य...ये...य.....।” लियाकत ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला लेकिन ये तय नहीं कर पाये कि मौलाना के रहस्योद्घाटन पर क्या कहे और लफ्जों को अधूरा

छोड़कर व्याकुल भाव से मौलाना की ओर देखने लगे।

“खौफ़जदा करने वाली बात ये नहीं है लियाकत साहब कि एक जिन्न हमारी दुनिया में घूम रहा है क्योंकि हर मुल्क में, हर इलाके में न जाने कितने ऐसे जिन्न होंगे, जो इंसानों की शक्ल-ओ-सूरत बनाए हुए हमारे बीच रह रहे होंगे। खौफ़ज़दा करने वाली असल बात तो ये है कि ये जिन्न बहुत ही ज्यादा गुस्से में है। इसकी आँखों से शोले बरस रहे हैं, ये हरदम जबड़े भींचे हुए है, मानो किसी को कच्चा चबा जाना चाहता हो। किस पर है इसका इतना गुस्सा? ये विनायक के क़त्ल में दिलचस्पी क्यों ले रहा है? इसने उस निशान को देखकर किस बात की तस्दीक की? ये अँधेरी दुनिया की किस शख्सियत की बात कर रहा था?” मौलाना ने लियाकत पर दृष्टिपात करते हुए आगे कहा- “बिना इन सवालों के जावाब हासिल हुए इस जिन्न का मकसद नहीं जाना जा सकता और न ही आपके किसी सवाल का जवाब।”

“मुझे तो..मुझे तो अभी भी यकीन नहीं हो रहा है कि तस्वीर वाला इंसान एक जिन्न है। वो तो...वो तो कोई अजीमुश्शान शख्सियत मालूम पड़ रहा है। उसके चेहरे पर करिश्माई नूर नजर आ रहा है।”

“किसी जिन्नात का असली रूप साधारण निगाहों वाले नहीं देख पाते लियाकत मियाँ। इसी बात का तो वे फायदा उठाते हैं और हमारे बीच आसानी से छिपकर रह लेते हैं।”

कमरे में पैनी खामोशी छा गयी। ताबेदार चाय का ट्रे रख गया लेकिन किसी का ध्यान उस ओर नहीं गया।

“तो अब?” लियाकत ने लम्बी खामोशी के बाद पूछा।

मौलाना ने गहरी साँस खींचकर आँखें बंद कर लीं। कुछ देर बाद आँखें खोलीं और कहा- “आप एक काम कीजिए, मुर्दाघर के आदमी को मेरे पास लेकर आइए। मैं उससे कुछ और बातें भी पूछना चाहता हूँ।”

लियाकत ने सहमति में सिर हिला दिया।

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फाह्याज़ और सुबोध गाड़ी से उतरकर उस तंग गली की ओर बढ़ गये, जिसके दोनों तरफ छोटे-बड़े रिहायशी मकान बने हुए थे। मकानों के रेलिंग लगे छज्जे इस कदर आगे निकले हुए थे कि चटख धूप का मामूली कतरा भी वहाँ अपनी मौजूदगी नहीं बना पा रहा था। कामरान हुसैन की रिहाइश तक पहुँचने के लिए उन्हें एक से अधिक बार लोगों से पूछताछ करनी पड़ी, तब जाकर वे कई मोड़ पार करने के बाद इच्छित मकान के सामने पहुँच पाए, जिसके दरवाजे पर मकान संख्या बताता हुआ जस्ते का एक छोटा सा टुकड़ा कील से ठोंका गया था। नेमप्लेट नदारद था। मकान एक मंजिला था और ऐसा कोई लक्षण नहीं दर्शा रहा था, जो ये इंगित करता कि उसकी बेहतर रख-रखाव हो रही है। डोरबेल न पाकर सुबोध ने दरवाजे पर थाप दिया।

“एक मिनट।” अंदर से आवाज़ आयी और फिर करीब दो मिनट बाद दरवाजा भी खुल गया।

सामने पैंतीस साल का युवक खड़ा था, जिसके बेतरतीब बाल, अस्त-व्यस्त कपड़े और लापरवाह चाल-ढाल इस बात की गवाही दे रहे थे कि वह दुनिया से कटा हुआ और हमेशा कूची के साथ रंगों में डूबा रहने वाला टिपिकल चित्रकार था।

“कामरान हुसैन?” सुबोध ने उस पर सवालिया निगाह डालते हुए पूछा।

“मुझे मालूम था आप लोग आयेंगे।” कामरान दरवाजे से परे हटता हुआ बोला- “लेकिन इतना देर क्यों हुआ आप लोगों को?”

दोनों अंदर दाखिल हुए। कमरा मध्यम आकार था, जिसे कामरान कार्यस्थल और बैठक; दोनों के लिए इस्तेमाल करता था। बायीं दीवार में दो अन्य कमरों में जाने के दरवाजे थे। एक ओर टेबल था, जिस पर लैपटॉप, ग्राफ़िक टेबलेट और आर्टिस्ट के जीवन में आये दिन इस्तेमाल होने वाले अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स पड़े हुए थे, जबकि दूसरी ओर एक ट्राईपॉड था, जिस पर चढ़े कैनवास पर अधूरी चित्रकारी नजर आ रही थी। करीब ही एक स्टूल पर रंग और कूची बिखरे पड़े थे। कमरा प्रथम दृष्टया ही किसी चित्रकार का घर दिखाई दे जाता था।

“प्लीज बैठिए आप लोग।” कामरान ने अपने हाथ में लगा रंग एक रद्दी कपड़े से पोंछते हुए और एल आकार के खस्ताहाल सोफे की ओर संकेत करते हुए कहा। जब फाह्याज़ और सुबोध सोफे पर काबिज हो गए तो उसने पूछा- “चाय लेंगे?”

“हम यहाँ तुम्हारी हॉस्पिटैलिटी के लिए नहीं आये हैं मिस्टर कामरान।” सुबोध ने सख्त लहजे में कहा- “हमें पूछताछ करनी है तुमसे।” वह थोड़ा रुका फिर आगे जोड़ा- “एक क़त्ल के सिलसिले में।”

“सॉरी सर।” कामरान झेंप गया, लेकिन उसके लहजे में कोई शिकन नहीं आया- “मैं तो बस मेहमाननवाजी के साधारण से उसूल को निभाना चाह रहा था। मुझे मालूम है कि आप विनायक शुक्ला की मौत को लेकर बात करना चाहते हैं। यकीन कीजिए, मैं आप लोगों की ही राह देख रहा था। मैं तो खुद आपको सब कुछ बताना चाहता हूँ क्योंकि इसमें आपका और मेरा, दोनों का ही फायदा है क्योंकि हो सकता है कि आपको एक पेचीदे केस से छुट्टी मिल जाए और मुझे मेरे

शाप से।”

“शाप?” सुबोध और फाह्याज़ की निगाहें आपस में टकराईं फिर दोनों ने लगभग एक साथ पूछा- “कैसा शाप?”

कामरान की मुखमुद्रा गंभीर हो गयी। वह अपनी जगह से उठा और उस ओर बढ़ गया, जहाँ रोल की हुई कई पेंटिंग्स रखी हुई थी। उसने उन रोल्ड पेंटिंग्स में से एक पेंटिंग उठायी और उसे लिए हुए दोबारा उनके पास आया।

“प्लीज इस पेंटिंग को देखिए।”

सुबोध ने रोल को थामा, उसे खोला मगर पेंटिंग में मौजूद सूरत पर नजर पड़ते ही उसके साथ-साथ फाह्याज़ की भी पेशानी पर लकीरें उभर आयीं।

“विनायक ने तुमसे अपनी पेंटिंग बनवायी थी?” फाह्याज़ ने पूछा।

“मैं जानता हूँ कि आप यहाँ किन सवालों के साथ आये हैं।” कामरान एक स्टूल खींचकर उन दोनों के सामने बैठ गया और बेहद सामान्य लहजे में बोला- “हत्या वाले दिन मैंने विनायक को फ्रेंड रिक्वेस्ट क्यों भेजा, उससे वाट्सएप पर इसके लिए क्यों जोर दिया कि वह मेरा फोन उठाये, मुझसे बात करे, मैं उससे बात करने के लिए इतना पजेस्ड क्यों था कि दर्जनों बार उसे फोन करता रहा, यहाँ तक कि उस वक्त तक भी जब वह शायद कत्ल हो रहा था, या हो चुका था?”

“बड़ी पहुँची हुई चीज हो बर्खुरदार।” फाह्याज़ व्यंग्यात्मक भाव से हँसा- “हमारे सवाल का जवाब देने के बजाय हमें इम्प्रेस करने की कोशिश करने लगे। सारी स्क्रिप्ट आपने ही तो नहीं लिखी है?”

“जी बिल्कुल नहीं। ये साधारण सी बात तो हर कोई जानता है कि क़त्ल के मामलों में पुलिस सीसीटीवी, सोशल मीडिया एक्टिविटी, कॉल डिटेल्स जैसी चीजें सबसे पहले खंगालती है। देर-सबेर आपको मुझ तक तो पहुँचना ही था। रही बात स्क्रिप्ट लिखने की, तो वो मेरा लिखा हुआ हो ही नहीं सकता। अगर आप टिपिकल पुलिसिया अंदाज में मुझ गरीब को हवालात में ठूँसकर डंडे तोड़ने पर उतर आयें तो अलग बात है, वरना ये तो आप भी जानते हैं कि असल मामला क्या है।” कहने के बाद कामरान बड़ी तीखी मुस्कान मुस्कुराया और आगे बोला- “अख़बार में उस अजीबोगरीब निशान की तस्वीर मैंने भी देखी।”

सुबोध, कामरान के उस आत्मविश्वास पर मन ही मन तिलमिला गया जबकि फाह्याज़ प्रभावित हुआ।

“तुम इस मामले में क्या जानते हो? विनायक से तुम्हारे क्या ताल्लुकात थे? उसकी पेंटिंग क्यों बनाई तुमने? तुम्हारी क्या बात हुई थी उससे? सब कुछ सिलसिलेवार बताओ हमें।” फाह्याज़ ने कहा।

“मैं तो बता ही दूँगा सर लेकिन मेरी बात पर यकीन करने के लिए आपको इस पूर्वाग्रह से मुक्त होना पड़ेगा कि ये दुनिया बस उतनी ही है, जितनी नजर

आती है।”

“मतलब?” फाह्याज़ और सुबोध ने समवेत स्वर में पूछा।

“मेरे साथ एक अजीब सा वाकया जुड़ा हुआ है जनाब।” कामरान का लहजा यकायक बेहद संजीदा हो उठा- “शायद आप मुझे पागल कहें या इसे मेरा कोई पैंतरा समझे लेकिन सच वही है, जो मैं बताने जा रहा हूँ।” कामरान कुछ देर तक खामोश रहकर अपनी बात शुरू करने के लिए उपयुक्त सिरा तलाशता रहा और फिर जब अभीष्ट सिरा उसके हाथ लग गया तो उसने अपनी बात आगे बढ़ायी- “मैं विनायक को नहीं जानता था; उस वक्त तक भी नहीं जानता था, जब मैंने उसकी तस्वीर बनायी।” सुबोध कुछ बोलने को आतुर हुआ लेकिन कामरान ने उसे खामोश करते हुए आगे कहा- “ये आपको हैरतजदा करेगा लेकिन मैं खुदा की कसम खाकर कहता हूँ कि मेरे साथ एक शाप बंधा हुआ है और वो शाप ये है कि कभी-कभी मेरा जेहन, मेरी उँगलियाँ और मेरी कूची मुझसे बगावत करके कैनवास पर ऐसी शक्ल बना देती हैं, जो मेरे लिए निहायत ही अजनबी होती है। मुझ पर कोई सुरूर सा तारी होता है और फिर मुझे आस-पास का कोई इल्म नहीं रह जाता। मुझे पेटिंग बनाने की इतनी भारी तलब लगती है कि मेरा खुद पर कोई जोर नहीं रह जाता। विनायक की तस्वीर भी मैंने ऐसे ही आलम में बनाई थी। जब मैं तस्वीर बनाकर हटा तो मुझे मालूम नहीं था कि ये शख्स राजनगर का रहने वाला है। अगर इसके बारे में मुझे कुछ मालूम था तो बस इतना कि.....।” कामरान खामोश हो गया और आगे कुछ बोलने से हिचकिचाने लगा।

“बस इतना कि...?” फाह्याज़ ने पूछा।

“ये कुछ ही दिनों में, ज्यादा से ज्यादा दस दिनों में मरने वाला है।”

फाह्याज़ और सुबोध दोनों को ही समझ में नहीं आया कि कामरान की बातों को स्वीकार करें या खारिज करें। सब कुछ सुनने के बाद वे निर्विकार भाव से उसे घूरते भर रहे।

“इसीलिए मैंने पहले ही कहा सर कि मेरी बातें सुनने से पहले आपको इस पूर्वाग्रह से मुक्त होना होगा कि आँखों से नजर आती दुनिया से इतर कुछ भी एग्जिस्ट नहीं करता।” कामरान ने कहा।

“इन शार्ट, तुम ये कहना चाहते हो कि कभी-कभी तुम ऐसे शख्स की पेंटिंग बना देते हो, जो जल्द ही मरने वाला होता है।”

“और ऐसा तुम किसी अज्ञात शक्ति के वश में होकर करते हो।”

बारी-बारी से की गयी फाह्याज़ और सुबोध की टिप्पणी पर कामरान खामोश रहा, कुछ बोला नहीं।

“मैं चेक करता हूँ सर...।” सुबोध ने खड़े होते हुए कहा- “मुझे यकीन है कि

विनायक की तरह इसके पास भी हमें सिजोफ्रेनिया की दवाएं मिलेंगी।”

“मैं मेंटली डिस्टर्ब नहीं हूँ सर।” कामरान लगभग चीखकर बोला। उसे सुबोध की टिप्पणी बेहद नागवार गुज़री थी- “ऐसा एक बार नहीं कई बार हुआ है मेरे साथ।”

फाह्याज़ ने अपने मातहत को बैठ जाने का संकेत किया और फिर कामरान से मुखातिब होकर सामान्य स्वर में कहा- “तस्वीर बनाने वाले शख्स को तुम जानते तक नहीं फिर भी तुम्हें ये यकीन क्यों होता है कि वह ज्यादा से ज्यादा दस दिनों में मर जाएगा? अव्वल तुम्हें ये लगता ही क्यों है कि जो शक्ल तुमने कैनवास पर उतारी है, उसका मालिक इस वास्तविक दुनिया में होगा और कुछ ही दिनों में यहाँ से कूच कर जाएगा?”

कामरान ने सुबोध की ओर देखा, मानो उसे इस बार भी उसकी ओर से उसकी जेहनी काबिलियत पर टिप्पणी होने का डर हो। उसकी मनोदशा भाँपकर फाह्याज़ ने हौले से सुबोध का हाथ दबाकर उसे ये हिदायत दी कि कामरान का जवाब जो भी हो, उसे खामोश रहना है।

“जवाब दो।” प्रत्यक्ष में उसने कामरान से कहा।

“जो आसमानी ताकतें मुझसे वे अनजान शक्लें बनवाती हैं, वही सपने में मुझे ये इशारे भी करती हैं कि चित्र वाला इंसान हकीकत में है और मरने वाला है।”

“कैसे सपने?” फाह्याज़ की आँखें गोल हो गयीं। शायद उसे इसका आभास मिलने लगा था कि उस चित्रकार को सपने में क्या दिखता रहा होगा।

कामरान ने एक बार फिर आशंकित भाव से सुबोध की ओर देखा।

“मैंने पूछा कि वे सो कॉल्ड आसमानी ताकतें तुम्हें सपने में क्या इशारे करती हैं?” इस बार फाह्याज़ के लहजे से धैर्य नदारद था।

“जिस दिन मैं उस रहस्यमयी उन्माद में डूबकर पेंटिंग बनाता हूँ, उसके अगले ही रात से मुझे एक सपना आने लगता है, जिसमें पेंटिंग वाला आदमी एक बड़े से कटोरे में भरे खून को एक आदमभेड़िया के ऊपर उड़ेल रहा होता है। फिर एक दिन ये सपना आना बंद हो जाता है और मैं ये अनुमान लगा लेता हूँ कि पेंटिंग वाला आदमी मर गया।”

फाह्याज़ सन्न रह गया। उसके साथ-साथ सुबोध की भी यही हालत हुई। इस बार उसे लगा कि दिमाग कामरान का नहीं, बल्कि उसका हिल गया है। यही सपना विनायक को आया था, थोड़े से अंतर के साथ फाह्याज़ को भी आया था और अब यहाँ आने के बाद ये खुलासा हुआ था कि यही सपना उस मुसव्विर को भी आया था, जो आसमानी दखल के बाद खुद ब खुद जल्द से जल्द मरने के लिए चयनित इंसानों की तस्वीर बना देता था। दोनों आँखें फाड़े हुए कामरान को

देखते रह गये।

“मैं जानता हूँ कि कोई इस पर यकीन नहीं करेगा सर लेकिन...लेकिन मैं क्या करूँ मेरे साथ ऐसा ही होता है। जब दस साल पहले पहली बार हुआ था तो नजरअंदाज किया था लेकिन साल भार बाद फिर यही हुआ। उसके बाद दो साल पर हुआ। अब तो कभी एक साल पर, कभी छ: महीने पर होता ही रहता है। मैं जब अम्मी से ये बताता था तो वो कहती थीं कि ये कुदरत का मुझसे बात करने का एक तरीका है। मुझमें कोई ख़ास बात है, इसलिए वह कुछ लोगों की मौत का फरमान पहले मुझ तक पहुँचाता है लेकिन मैं अम्मी की बातों से न तो तब इत्तेफाक रखता था और न ही आज रखता हूँ।

मौत बेरहम शै है सर, ये लोगों की दुनिया उजाड़ देती है, किसी के हँसते-खेलते जीवन को पल भर में बर्बाद कर देती है; और मेरी कूची....मेरी कूची किसी के लिए वही मौत लेकर आती है, ये मैं कैसे बर्दाश्त करूँ?” कामरान ने कुछ पल ठहरकर भावनाओं को काबू में किया फिर आगे कहा- “मैं पिछले कई साल से उन लोगों को असल दुनिया में तलाशने के कोशिश कर रहा हूँ, जिन्हें मेरी कूची मौत का फरमान सुनाती है। इसके लिए मैं फेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, यूट्यूब, लिंक्डइन जैसे लगभग सभी ऑनलाइन डेटाबेस को खंगालने के अलावा हर संभव तरीकों से उस शक्ल को ढूँढना शुरू करता हूँ। पहली सफलता विनायक के केस में मिली थी और क्या शानदार मिली थी कि वह शख्स मेरे बगल में ही था।

मैंने विनायक से बात की, उसे ये यकीन दिलाने की हर कोशिश की कि उसकी जान को किसी आसमानी आफ़त से खतरा है मगर जब उसने यकीन नहीं किया तो मैंने कुत्ते-बिल्लियों का दूरी बनाना, हमेशा नर्वस रहना वगैरह ऊपरी बाधा से ताल्लुक रखती चीजों का हवाला देकर हवा में तीर चलाया। मेरा तीर निशाने पर लगा, उसे मुझ पर यकीन हुआ और उसने अगली सुबह मेरे साथ मीटिंग फिक्स की पर वह अगली सुबह आ ही न सकी। शायद मुझे ही देर हो गयी थी। मैं उस तक उस दिन पहुँचा था, जिस दिन मौत का फ़रिश्ता उसे लेने आने वाला था।”

सुबोध, कामरान की बातों से तनिक भी मुतमईन नहीं हुआ था, ऐसा उसकी शारीरिक भाषा से नजर आया। कोई और परिस्थिति होती तो शायद फाह्याज़ भी उन बातों पर ज़रा भी संजीदा नहीं होता लेकिन मौजूदा हालात में जिस स्पष्टता के साथ कामरान ने अपनी हाल-ए-जिंदगी बयाँ की थी, उसने फाह्याज़ को सोचने पर मजबूर कर दिया था। रही-सही कसर उस सपने के जिक्र ने पूरी कर दी थी, जो डॉक्टर के स्टेटमेंट के मुताबिक़ मरहूम विनायक को भी आता था। किसी ऐसे ख्वाब की बात को भला फाह्याज़ कैसे खारिज कर देता, जिसका भुक्तभोगी वह

खुद भी बना था।

“तुम्हें पता है कामरान....।” सुबोध ने खामोशी भंग की- “कि ठीक तुम्हारे जैसा ही ख्वाब विनायक को भी आता था?”

“अब तक नहीं पता था लेकिन अभी आपने बताया तो पता चला गया।”

“ज्यादा होशियार मत बनो।” सुबोध के जबड़े भींच गए- “विनायक से क्या दुश्मनी थी तुम्हारी?”

“मेरी दुश्मनी?” कामरान स्टूल पर से उछल पड़ा- “मैं तो उसे जानता तक नहीं था सर।”

“विनायक की मानसिक हालत ठीक नहीं थी, वह मनोचिकित्सक के पास जाता था। तुमने इन्हीं चीजों का फ़ायदा उठाया, एक फैंटास्टिक कहानी गढ़ी और विनायक के क़त्ल का इल्जाम किसी आसमानी आफ़त के सिर पर मढ़ दिया।”

“क..क्या बात कर रहे हैं सर....।” कामरान ने इस भाव से फाह्याज़ की ओर देखा, जैसे अब उसे सुबोध से बात करना फिजूल लगने लगा हो- “आप ही इन्हें समझाइए सर कि अगर कातिल मैं होता और इतना शातिर होता कि बिना कोई सुराग छोड़े अपने शिकार को क़त्ल कर आया होता तो आख़िरी समय तक उसे कॉल करते रहने की बेवकूफ़ी करके खुद से पुलिस को घर बुलाने का रास्ता क्यों तैयार करता? जिस वक्फे में विनायक की मौत हुई, उस वक्फे की मेरे मोबाइल की लोकेशन निकलवा सकते हैं आप। मैं और तरीके से भी ये साबित कर सकता हूँ कि जब विनायक की मौत हुई, तब मैं यहाँ था, न कि राजनगर में।”

“कैसे साबित करोगे?” फाह्याज़ ने पूछा।

“आपको एक ढाबे वाले से, एक ऑटोरिक्शा वाले से और शहर के कब्रिस्तान के चौकीदार से मिलना होगा। ये लोग खुद ब खुद आपको बता देंगे कि मैं कहाँ था।”

“ढाबे वाले और रिक्शेवाले का तो समझ में आता है लेकिन किसी कब्रिस्तान का चौकीदार कैसे बताएगा कि तुम कहाँ थे?” सुबोध ने पूछा।

कामरान लम्बी साँस खींचकर खामोश हो गया और अपनी गोल-गोल आँखों से सुबोध को यूँ घूरने लगा, जैसे उसके जवाब को समझने के लिए सुबोध अभी बच्चा हो।

“अब बताओगे भी या घूरते ही रहोगे?” अंतत: सुबोध को कहना पड़ा।

“बताऊँगा मगर उससे पहले मैं चाहता हूँ कि आप मेरे घर की तलाशी लेकर ये तसल्ली कर लें कि मैं दिमागी बीमारी की कोई दवाई नहीं खाता। मैं ये भी चाहता हूँ कि आप मुझसे ब्रेन ट्विस्टिंग का कोई सवाल करके या मेरे सर्टिफिकेट्स देखकर मेरी जेहनी कुव्वत के प्रति अपनी तमाम शंकाओं को निपटा लें क्योंकि मेरा जवाब सुनने के बाद अगर आपने कोई नाकाबिल-ए-बर्दाश्त टिप्पणी की तो हो सकता है कि मैं अपने आपको रोक न पाऊँ, बाद में भले आप मेरा एनकाउंटर कर दें।”

फाह्याज़ जोर से हँस पड़ा, जबकि सुबोध बड़ी मुश्किल से खुद को जब्त कर पाया।

“तुम बताओ, अगर हम उस पर अगर यकीन नहीं करेंगे तो तुम्हें ठेस पहुँचाने वाला कोई कमेंट भी नहीं करेंगे।” फाह्याज़ ने शांत लहजे में कहा।

“मैं वहाँ हर रोज़ अम्मी को खाना खिलाने जाता हूँ, कब्रिस्तान का चौकीदार इसी बात की गवाही देगा।”

“तुम्हारी अम्मी कब्रिस्तान में रहती हैं?”

“नहीं, कब्र में रहती हैं।”

जवाब सुनकर फाह्याज़ और सुबोध ने बौखलाकर एक दूसरे की ओर देखा। सुबोध कुछ कहने को आतुर हुआ लेकिन फाह्याज़ ने पलक झपकाकर उसे शांत रहने का संकेत किया और स्वयं कामरान से मुखातिब होकर बोला- “बहुत प्यार करते थे अपनी अम्मी से?”

“करता था नहीं, करता हूँ।” कामरान ने सहज भाव से कहा- “मैं हर रोज ढाबे से खाना लेता हूँ, फिर ऑटोरिक्शा से कब्रिस्तान पहुँचता हूँ। उसका घर उसी रास्ते पर कब्रिस्तान के बाद पड़ता है इसलिए वह हर रोज़ मेरा इंतजार करता है। बदले में मैं उसे एक चक्कर का फुल पेमेंट करता हूँ। मैं वहाँ अम्मी को खाना खिलाता हूँ, खुद भी खाता हूँ। उसके साथ थोड़ी देर तक बातें करता हूँ, फिर पैदल ही लौट आता हूँ।”

“कब्र में लेटी माँ को खाना खिलाते हो तुम।” फाह्याज़ ने नपे-तुले लहजे में कहा- “कहने को जी नहीं चाहता कामरान मियाँ लेकिन ये सच तो मुझे आपको बताना ही पड़ेगा कि माँ के प्रति तुम्हारी मोहब्बत अब एक मानसिक बीमारी बन रही है या शायद बन चुकी है।”

“अगर ये कोई मानसिक रोग है तो मैं नहीं चाहता कि मेरा ये रोग ठीक हो, अगर मैं पागल हूँ तो मैं नहीं चाहता कि मेरा पागलपन ठीक हो, अगर मैं भ्रम में जी रहा हूँ तो मैं नहीं चाहता कि मेरा भ्रम टूटे। मैं बस इतना चाहता हूँ अम्मी से मेरी मुलाक़ात का ये सिलसिला मेरे जीते जी बदस्तूर चलता रहे, तब तक चलता रहे, जब तक मैं भी उसके बगल की एक कब्र में लेट न जाऊं।”

माहौल गंभीर हो गया। अभी तो कुछ हद तक ठीक था लेकिन माँ के प्रति कामरान का वो ऑब्सेशन आगे कितना आक्रामक हो सकता था, इसकी कल्पना मात्र से दोनों पुलिसकर्मियों के मन में उसके लिए सहानुभूति उमड़ पड़ी।

“विनायक की मौत के बाद तुम्हें नरभेड़िया के सपने आने भी बंद हो गए होंगे?” थोड़ी देर बाद फाह्याज़ ने पूछा।

“जी हाँ। सपनों का आना बंद होते ही मुझे ये एहसास हो जाता है कि एक और बदनसीब मेरी वजह से बेवक्त इस दुनिया से उठ गया फिर मैं उसे ढूँढने की तमाम कोशिशें रोककर अपनी मनहूसियत पर आँसू बहाने लगता हूँ। कभी-कभी तो सोचता हूँ कि अपना पेशा ही बदल दूँ लेकिन मुझे इसके आलावा और आता ही क्या है, जो मेरे गुजर-बसर का सबब बन सकता है। और फिर, वह जो भी शैतानी ताकत है, उसका तो मेरे पेशे से कोई ताल्लुक है ही नहीं। वह तो जब चाहे मुझसे तस्वीरें बनवा सकती है; मैं पेशे में रहूँ या न रहूँ, इससे क्या फर्क पड़ता है।” कामरान थोड़ा रुका, फिर आगे बोला- “अगर मेरे ऊपर बूढ़ी माँ की जिम्मेदारी नहीं होती तो मैं इस मनहूसियत से तंग आकर खुदकुशी कर चुका होता।”

“तुमने इस मनहूसियत से उबरने के लिए किसी जानकार मसलन कि पीर-मौलाना की मदद लेने की कोशिश नहीं की?” फाह्याज़ ने जान-बुझकर ‘मनोचिकित्सक’ की जगह ‘पीर-मौलाना’ शब्द का प्रयोग किया ताकि कामरान फिर खूँटे से न उखड़ जाए।

“मैं इन लोगों के दुनियावी इल्म में यकीन नहीं करता। अगर वाकई कोई शैतान मुझे जरिया बनाकर लोगों का क़त्ल कर रहा है तो मुझे उससे निजात सिर्फ अल्लाह दिला सकता है, उसकी पैरवी करने वाला कोई पीर-फ़कीर नहीं।”

“यानी कि तुमने उस आसमानी आफ़त से निजात पाने का कोई जतन ही नहीं किया? सब-कुछ ऊपर वाले पर छोड़ दिया?” फाह्याज़ हैरतजदा हुआ।

“जतन किया तभी तो आप लोग मेरे सामने बैठे हैं।” कहकर कामरान शांत हुआ लेकिन जब उसे लगा कि सामने बैठे लोग उसकी बात नहीं समझ पाए तो उसे कहना पड़ा- “मुझे लगता है कि अगर मैंने किसी एक शख्स की जान-बचाकर इस सिलसिले को तोड़ दिया तो मेरा शाप ख़त्म हो जाएगा, जैसा कि एक हॉलीवुड फिल्म ‘फाइनल डेस्टिनेशन’ में होता है। अफ़सोस कि इस बार मैं बेहद करीब पहुँचकर भी चूक गया।”

फाह्याज़ ने तिरछी नजर से सुबोध की ओर देखा, जिसकी शक्ल पर ये साफ़-साफ़ लिखा हुआ था कि विनायक जैसे एक बीमार की आत्महत्या को लेकर इतनी भागदौड़ और दिमाग खपाने को वह पुलिस महकमे की घोर बेइज्जती के सिवाय और कुछ नहीं समझ रहा था।

“चित्रकारी तुमने कहाँ से सीखी है?” कुछ देर बाद फाह्याज़ ने कामरान से पूछा।

“विरासत में मिली है। मेरे वालिद बहुत अच्छे मुसव्विर थे। बचपन में उन्हें

चित्रकारी करते हुए देखता था तो मेरे हाथ भी कूची थामने के लिए मचलने लगते थे फिर जब मैं कूची संभालने के काबिल हुआ तो अब्बा मुझे भी रंग बनाकर देने लगे। फिर एक दिन मेरी मोहब्बत रंगों से कराकर वे चले गये और मैं उनकी दी हुई कूची से अपने जीवन के कैनवास को रंगने में मशरूफ़ हो गया। आगे चलकर सरस्वती कला निकेतन से बैचलर ऑफ़ फाइन आर्ट करने के बाद ग्राफ़िक डिजाइनिंग और डिजिटल आर्ट से जुड़े कुछ सर्टिफिकेट कोर्स करके मैं मायानगरी चला गया, जहाँ कुछ दिन प्रोडक्शन डिजाइनिंग का काम किया। बड़े प्रोडक्शन हाउस के कई एनीमेशन प्रोजेक्ट्स और विडियो गेम्स की कांसेप्ट डेवलपिंग में भी काम किया लेकिन अम्मी को यहाँ छोड़कर वहाँ ज्यादा दिन तक मेरा दिल नहीं लगा। पैसे और शोहरत कमाने की मेरी भूख जल्द ही मिट गयी और मैं यहाँ चला आया।”